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सुरेंदर शर्मा और सुनील जोगी ने श्रोताओं को किया मंत्रमुग्ध

जाने-माने कवियों शसुरेंदरर्मा और सुनील जोगी राष्ट्र की राजधानी दिल्ली में एक मंच पर मौजूद हों, तो श्रोताओं का कितनस मनोरंजन हो सकता है, इसका अनुमान लगाना भी असंभव है। टेलीविजन और रंगमंच के लिए कई शोज और वृत्तचित्रों के अलावा “रे विज़िटिंग द एपिक्स“, “वंस अपॉन ए टाइम“ जैसे रंगमंचीय प्रोजेक्ट दे चुकी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी ‘मिरान’ प्रोडक्शंस की संस्थापक सुजाता सोनी बाली द्वारा इंडिया हैबिबेट सेंटर में प्रस्तुत यह कार्यक्रम था ‘एक अलग शैली के साथ हास्य : कॉमेडी एंड कवि’, जो दिल्लीवासियों के लिए एक मजेदार शाम साबित हुई, क्योंकि यह शाम हंसी, कविता और व्यंग्य से भरी था।

खैर, कार्यक्रम में भारत के प्रसिद्ध कवियों ने शादी, राजनीति, सोशल मीडिया इत्यादि जैसे विभिन्न मुद्दों पर निराला और हास्यपूर्ण कटाक्ष किया। सुरिंदर शर्मा और सुनील जोगी ने मौजूद श्रोताओं को अपनी कविताओं से मोहित कर दिया। जहां तक कवियों की बात है, तो सुरिंदर शर्मा खुद और उनकी पत्नी के कॉमिक स्केच के लिए जाने जाते हैं। वह अपने ‘चार लाइन सुना रायो हूं’ के लिए खास तौर पर जाने जाते हैं। वह मूल रूप से हरियाणा से संबंध रखते है और अपनी कविताओं में हरियाणवी लहजे का बहुत अच्छा समावेश करते हैं। कभी-कभी वह मनोरंजन के लिए मारवाड़ी भाषा का भी उपयोग करते है। वह हास्य रस (व्यंग्ययात्मक कविता) के टॉप के चंद कवियों में से एक हैं। उन्होंने कवि सम्मेलनों के बीच हास्य-रस की परंपरा की स्थापना की है। वर्ष 2013 में सुरिंदर शर्मा को भारत सरकार द्वारा चौथे सर्वोच्च नागरिक अलंकरण ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया था।
एक लेखक, कवि और अपने कॉमिक छंदों के लिए प्रसिद्ध सुनील जोगी भी पद्मश्री से सम्मानित कवि हैं। वह वर्णन की अपनी विशिष्ट शैली के लिए जाने जाते हैं। वह छोटे और मीठे तरीके से कविताओं के जरिये अपपनी बात कहते हैं, लेकिन उसमें होता है एक अनूठा पंच। सुनील जोगी हिंदुस्तान अकादमी के अध्यक्ष हैं और उत्तर प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री के पद पर हैं। वह 75 से अधिक किताबों के लेखक हैं।

कुछ लिख रखा था जब-तब यहाँ-वहाँ तुम्हारे लिए ! डॉ शशि धनगर ©®

आज कुछ अधूरा सा है
कुछ लिख रखा था
जब-तब यहाँ-वहाँ
तुम्हारे लिए !
तुम होते नहीं जब साथ
तो उंगलियां चलने लगतीं है पन्नों पर
बातें करतीं है तुमसे अनगिनत !
सोचा था जब आओगे करीब मेरे
सौंप दूँगी तुम्हें
तुम्हारी अमानत !
हर उस लम्हें में जब
तुम्हें चाहा साथ
पर तुम नहीं थे लिए हाथों में हाथ !
आज वो सारे पन्ने खो गए
अब कैसे कहूँगी तुमसे आपबीती
मेरे दिल जैसे बैठा से जा रहा है !
तुम पता नहीं कहाँ व्यस्त हो
क्यों बेवक़्त हो जाते अस्त हो !
शायद अब तुम
सुबह सूरज के साथ ही आओगे !
तब तक मैं क्या करुँ
कुछ तो बताओ
जो किस्से थे अधूरे से
वो कैसे सुन पाओगे !!

डॉ शशि धनगर ©®

ये हंसती खिलखिलातीं स्त्रियाँ “

“ये हंसती खिलखिलातीं स्त्रियाँ ”

डॉ शशि धनगर©®
सही ही है …
जो चुटकले बनते हैं इन पर 
बड़ी नाटकबाज होतीं है…
ये हंसती खिलखिलातीं स्त्रियाँ !
लाली, क्रीम और सिन्दूर में 
छुपा लेती हैं सारी कहानियां 
मेकअप का काम ही है 
किरदार को जी जाना …
और बखूबी करतीं हैं 
ये हंसती खिलखिलातीं स्त्रियाँ !
दुनियां रंगमंच है 
और हम सब किरदार यहाँ
शेक्सपियर ने भी देखीं थीं…
शायद ये हंसती खिलखिलातीं स्त्रियाँ !
पानी जैसा उनका रंग 
जो मिले उसमें घुल जातीं 
असम्भव को आसां कर देतीं 
कोई कितनीं बनाये कहानियां …
आखिर घर घर में हैं ऐसीं रवानियाँ !
इसीलिए चुटकुले बनते हैं उन पर
सब सुनो और भूल जाओ …
अग़र कहानी बनी तो अमर हो जाएँगी !
तथाकथित कर्णधारों को फिर कौन सराहेगा
और उनकी कहानियां धरीं रह जायेंगीं… 
क्योंकि, घर-घर में हैं 
ये हंसती खिलखिलातीं स्त्रियाँ !! 

हिंदी फिल्में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभातीं है.. डॉ शशि धनगर

जनमानस की मानसिकता बनाने में…या यूँ कहो कि लोगों के सोचने समझने के नज़रिए को ही बदल देतीं हैं। ‘मैरीकॉम’ और ‘दंगल’ फ़िल्म प्रत्यक्ष प्रमाण है इसका…क्योंकि ये महिला खिलाड़ी तो काफी पहले ( मैरीकॉम 2002 और गीता फोगाट 2010) अपने परचम फ़हरा चुकीं थीं…पर आम जनमानस में इन खेलों को अपनाने की प्रवृति इन फिल्मों के बाद अपने चरम पर देखी गयी।

जब मीडिया का यह प्रारूप इतना प्रभावी है, तो इसकी जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है, कि आम फिल्मों का परिवेश क्या हो ? कथानक कोई भी हो…पर उसमें लड़कियों से दुर्व्यवहार को हतोत्साहित किया जाए। कोई जरूरत नहीं कि हिट फिल्मों के लिए ‘हम आपके है कौन’ का ही विषय लेना पड़े, जिसमें माता-पिता अपनी लड़कियों को सुशील गृहणी बनाकर ही सुखी हो जाये। (जो काल्पनिक है,क्योंकि ससुराल में बहुओं को इतने लाड़-प्यार से नहीं रखा जाता और बहू के माता-पिता को गरीब होने पर इतनी इज़्ज़त नहीं दी जाती जैसा कि ‘विवाह’ फिल्म में दिखाया गया है…सब जानते हैं कि गरीब परिवारों की बेटियां ताने सुनकर ही अपने वैवाहिक जीवन की गाड़ी चलातीं हैं, चाहे कितनी भी पढ़ी-लिखी क्यों न हों…कई बार तो रोजगार करने वाली महिलाओं को भी घुट-घुट कर वैवाहिक जीवन बसर करते देखा गया है)
दूसरी तरफ ‘दंगल’ फिल्म भी हिट हो सकती है…जो सच्चाई पर आधारित है। सारे पुरुष सुबह सैर (morning walk) पर जायें औऱ सभी बहुयें जिसमें एक विदेश में पली-बढ़ी, दूसरी डॉक्टर हो, घर मे नौकरों की फौज होने पर भी सबका नाश्ता बनाकर और सज-धज कर पतिओं का इंतज़ार करें…और वो भी तब, जब वे अपने हनीमून पर गयीं हों…उफ्फ़ इतना नाटक बर्दाश्त नहीं किया जा सकता…जैसा कि ‘हम साथ-साथ हैं ‘ में दिखाया गया है। हाँ, इसका नुकसान ये है कि बेटों के माता-पिता ऐसी बहुओं की मांग करते हैं, और न मिलने पर अपना और बेटे-बहू का जीवन भी बर्बाद करते हैं।
जिन लोगों को मेरे विचार अतिवादी लगरहे हों… उनसे बस इतना जानना चाहूँगी कि क्या वे अपनी बेटियों को ‘हम आपके हैं कौन’ ‘विवाह’ या ‘हम साथ- साथ है’ की नायिकाओं का जीवन देना चाहेंगे….?
इसी तरह पर्यावरण सरंक्षण को महत्व के लिए फिल्मी कलाकारों को साइकिल चलाते दिखाकर इसका चलन बढ़ाया जा सकता है।
भ्रष्टाचार की नकारात्मकता की चरम सीमा को दिखाया जा सकता है साफ-सुथरे वातावरण में काम करने वाले लोगों का अच्छा स्वास्थ्य और मानसिक स्वतंत्रता को भुनाया जा सकता है।

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अथॉरिटी अधिकारियों को काम शुरू कराने का आदेश दिया

सांस्कृतिक पर्यावरण जीव जंतु केंद्रीय मंत्री माननीय श्री डॉ महेश शर्मा जी ने ग्रेटर नोएडा अल्फा टू गोल्फ ग्रा डीना सोसाइटी पारसनाथ स्टेट ओमेगा फर्स्ट टुडे होम्स विंग पार्क पी 3 supertech czar आशियाना अपार्टमेंट गाना सेकेंड सोसाइटी में जनता की समस्याएं सुनी व उनका निदान कराने का कार्य किया
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रेजिडेंशियल वेलफेयर एसोसिएशन वह सोसायटी के लोगों ने माननीय मंत्री जी का फूल मालाओं के साथ स्वागत किया मैं उनका आभार व्यक्त किया सोसायटी के लोगों की समस्याओं को सुनते हुए उन्हें पूरा कराने का अथॉरिटी अधिकारियों को काम शुरू कराने का आदेश दिया इस मौके पर सोसायटी के लोगों में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री माननीय डॉ महेश शर्मा जी ने कहा कि केंद्र सरकार के 4 साल पूर्ण होने पर देश के हर क्षेत्र में हर वर्ग का विकास किया है देश दुनिया में भारत का गौरव बढ़ाया है गौतम बुद्ध नगर लोकसभा क्षेत्र में लगभग 50000 करोड़ के काम जैसे जेवर एयरपोर्ट खुर्जा में बिजली घर का शुभारंभ नाइट सफारी ग्रेटर नोएडा नॉलेज पार्क में सांस्कृतिक भवन और अनेकों कार्य योजना अपने लोकसभा क्षेत्र में संचालित हुई हैं

दिन से यहां पर उद्योग इंडस्ट्री आदि संचालित होंगी जिनसे यहां के निवासियों को लाभ पहुंचेगा बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा करोड़ों लोगों को उज्ज्वलता गैस कनेक्शन करोड़ों लोगों के प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत बैंक खाते बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ योजना अटल पेंशन योजना आदि ऐसे सैकड़ों योजनाएं केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार द्वारा संचालित की जा रही है जिनसे सबका साथ सबका विकास हो रहा है इस अवसर पर मुख्य रुप से जिला उपाध्यक्ष मुकेश नागर नीरज शर्मा राजा रावल राहुल पंडित महेश शर्मा सतीश गुलिया जिला मीडिया प्रभारी पंडित कर्मवीर आर्य सतवीर भाटी सतीश गोयल बीएस डागर सत्यपाल शर्मा विनोद शर्मा भगवत शर्मा अनु पंडित अरुण प्रधान अजय निगम बीना भाटी मेघराज भाटी भगवत शर्मा सोहित पंडित गजेंद्र शर्मा आदि सैकड़ों कार्यकर्ता और सैकड़ों सोसायटी के लोग मुख्य रूप से उपस्थित रहे

कभी जिस नदी का पानी पीने के लिए प्रयोग में लाया जाता था | हरेंद्र भाटी

एक्टिव सिटीजन टीम
गौतमबुद्धनगर
मित्रो, इस आलेख के साथ, आपको हिंडन नदी की दुर्दशा के चित्र भेज रहा हूँ । चित्र में एक चरवाहा बालक हिंडन को देख कर अपने भविष्य के लिए मन ही मन रो रहा होगा ।


कभी जिस नदी का पानी पीने के लिए प्रयोग में लाया जाता था आज एक गंदे नाले में परिवर्तित हो चुकी है।
कुलेसरा के इस पॉइंट पर कुलेसरा से बह कर आये गंदे पानी के नाले इस नदी की धारा को बद से बद तर कर रहे हैं ।

लोगों ने इसके किनारों पर भवन निर्माण की सामग्री की दुकानें लगाई हुई हैं । जगह अलॉट करवाई है या अनिधिकृत रूप से कब्जा किया हुआ है , पता नहीं ।
मेरठ मंडल के आयुक्त श्री प्रभात कुमार जी भी इस नदी के बचाव में एक दिन नदी को साफ़ करने के लिए गंदे पानी में घुसे थे पर शायद अब वह भी अब इस बात से अनभिज्ञ होंगे कि उनके साथ आये अधिकारी कसमें खा कर अब मूक हो बने खड़े हैं ।
हिंडन के किनारे लगाए गए पेड़ो की सुधि लेने वाला कोई नहीं हैं । मंगवाए गए ट्री गार्ड्स कभी लगाए ही नहीं गए । कुछ चोरी हो गए, कुछ खराब हो गए तो कुछ अभी भी लगाए जाने की बाट जोह रहे हैं ।
दोस्तो, ये नदियाँ अगर मर गयीं न ? तो हम सब भी नहीं बचेंगे । आज से ही प्रण लीजिये कि पर्यावरण को बचाने के लिए जो भी संभव होगा, हम करेंगे ।

हॉलिडे होमवर्क –कितना प्रासंगिक-शशि धनगर

बच्चों की छुट्टियों की ख़ुशी के साथ एक बीमारी भी घर आती है, जो है हॉलिडे होमवर्क, बीमारी इसलिए कहा कि माता-पिता, बच्चे और टीचर्स सभी इससे त्रस्त होते हैं…किसी तरह निपटाना चाहते है, और किसी को इसकी उपयोगिकता समझ नहीं आती…क्योंकि इसमें लगभग ९०% कार्य स्वयं बच्चे नहीं कर सकते

…अधिकांशतः सभी बच्चों की मां को ही करना होता है….क्योंकि जो भी प्रोजेक्ट्स दिए जाते हैं, वे उस उम्र के बच्चे नहीं कर सकते…कुछ पिता भी करते हैं…और सबसे भयानक बात ये कि यह होमवर्क पैसे लेकर व्यवसायिक लोगों के माध्यम से किया भी जाता है…माता-पिता दोनों के व्यस्त होने के कारण लोग ऐसा करवाते भी है…कोई नहीं बता सकता कि इसकी आवश्यकता क्या है…उपयोगिता क्या है…और प्रासंगिकता क्या है…???

हॉलीडेज में बच्चों से कुछ सिलेबस में से कुछ लिखवाया जाये, याद करने को दिया जाये, कुछ ऐसा करवाया जाये, जिससे बच्चे का मानसिक या शारीरिक विकास हो तो बात समझ में आती है…लेकिन प्रोजेक्ट्स के नाम पर ऐसे कामों की भरमार करना, जो उस उम्र के बच्चे को समझ न आये…और माँ-पिता के लिए हॉलिडे होमवर्क करवाना एक चुनौती बन जाये…तो बस यही लगता है…कि कोई भी न उपयोगिता देख रहा, न प्रासंगिकता…बस सभी भेड़-चाल में लगे हुए है…तार्किक उत्तर देने में कोई समर्थ नहीं…क्योंकि सभी स्कूलों में ऐसा हो रहा है…इसलिए सब वैसा करने पर मजबूर हैं…!
यही स्तिथि स्कूल की टीचर्स के साथ भी है, स्कूल में क्या हो रहा है, वह करवाने से ज्यादा ध्यान इस बात पर दिया जाता है, कि वह अभिभावक को पता लगे, जिसमे टीचर्स की क्षमता और वक़्त लगता है… उन्हें स्कूल के लिए ढेरों प्रोजेक्ट्स बनाने होते हैं, जो बच्चों के नाम पर घर भेजते हैं, जबकि माँ-पिता जानते हैं कि ये उनके बच्चों ने नहीं किया…हर तीज-त्यौहार पर टीचर्स का काम इतना बढ़ जाता है, कि वे बच्चों पर समुचित ध्यान नहीं दे पातीं…!
जबकि यही वक़्त वे बच्चों के साथ वहां लगा सकती हैं, जहाँ बच्चा कमजोर है ,यही बात मां-पिता के साथ लागू होती है..कि वे छुट्टियों में बच्चों के कमजोर क्षेत्रों को मजबूत करने की जगह प्रोजेक्ट्स पूरे करने में लगे होते हैं…
और पूरे साल ढेरों टेस्ट्स और विभिन्न एक्टिविटीज के कारण बच्चों को जो फ्री टाइम नहीं मिल पता, वे हॉलीडेज में उस खाली वक़्त का मज़ा ले अकते हैं…आखिर कभी तो उन्हें स्वतंत्र भी छोड़ा जाये…!
में प्रोजेक्ट्स के खिलाफ नहीं, पर ये प्रोजेक्ट्स बच्चों के उम्र और अनुभव के हिसाब से ही होने चाहिए, और संख्या बहुत कम या केवल एक होनी चाहिए…जो बच्चा मन से करेगा खाली वक़्त का उपयोग भी करेगा…व्यस्त दिनचर्या की जगह कुछ गुणवत्तायुक्त समय भी अपने लिए जी सकेगा ! सभी बच्चे अपने शौक और इच्छा के अनुरूप कोई एक चीज बना कर लायें, जिसमे ये विशेष ध्यान हो, कि वो बच्चा बना सकता हो…साथ ही सामूहिक रूप से भी कुछ प्रोजेक्ट्स बच्चों से बनवाए जा सकते हैं, जिससे बच्चों में टीम भावना आए…!
कब तक सभी इस भेड़-चाल में चलेंगे, नहीं पता…ये सब बहुत दिनों तक तो नहीं चलेगा, क्योंकि अप्रासंगिक चीज़ें, लोग और विचार अपना महत्व खो देते हैं…लेकिन क्या ये सब जल्दी नहीं हो सकता???

देश के लिए शहीद हुए वीर सपूतों को को किया

दनकोर ब्लॉक के अट्टा गुजरान गांव में 14 मई को देश के लिए शहीद हुए वीर सपूतों की यादगार के उपलब्ध मे समस्त ग्रामवासियों ने देशभक्ति रागनियां कराकर वीर सपूतों को याद किया

इस दौरान किसान कामगार मोर्चा के युवा जिला अध्यक्ष अरविंद सेक्रेटरी ने बताया की 14 मई 1857 के दिन ग्राम अट्टा गुजरान व समस्त क्षेत्र के पाच शहीद इन्दर सिह,शहीद नथा सिंह,शहीद रायबक्स सिंह,शहीद सरजीत सिंह,शहीद दरियाव सिंह, वीर सपूतों ने हंसते हंसते इस देश के लिए अपना बलिदान दिया था इस मौके पर समस्त ग्रामवासियों ने पेड़-पौधे लगाकर शहीदों को याद किया इस मौके पर युवा जिला अध्यक्ष अरविंद सेक्रेटरी ने अपने विचार रखें इस मौके पर,जगवीर सेक्रेटरी,बले नेताजी,लज्जाराम प्रघान,उघम नागर,अरविंद सेक्रेटरी ,श्रीनिवास आर्य,बेगराज नागर,ओमवीर प्रघान,थानसिह मुखिया, जयवीर नागर, सन्दीप नागर,ओमकार नागर, बाबा देशराज नागर, बाबा लखमी नागर,जयपाल नागर, बेदी नागर, नरेनद्र नागर आदि लोग मोजुद रहे

सर्किट हाउस में नहीं बल्कि संन्यासियों की तरह सादगी से रुकेंगे – मुख्यमंत्री

लखनऊ :- उत्तर प्रदेश में लगातार बिगड़ती कानून व सरकारी व्यवस्थाओं को लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वे पूरी तरह से एक्शन में आ गए हैं। वे अब कोई हीला-हवाली बर्दाश्त नहीं करने वाले। इसी श्रेणी में वे आज अचानक शहाजहांपुर गए जहा आज

यानि रविवार को उन्होंने मंडी स्थल का दौरा किया। जिसके बाद वे अंक गन्ना तौल केंद्र पर पहुँचे और गन्ना-किसानों की समस्याएँ सुनीं। मुख्यमंत्री की इतनी अचानक सक्रियता से पूरे प्रशासनिक हल्के में हड़कंप मचा हुआ है।
मुख्यमंत्री के क़रीबी सूत्रों की मानें तो 23 और 26 अप्रैल की रातें वे दो अलग-अलग जिलों में बिताएँगे। सूत्रों ने जानकारी दी है कि पहले क्रम में ये दो जिले क्रमश: अमरोहा और प्रतापगढ़ होंगे। मुख्यमंत्री इन जिलों में सर्किट हाउस में नहीं बल्कि संन्यासियों की तरह सादगी से रुकेंगे। शायद वे पंचायत घर अथवा किसी गाँव के प्राथमिक विद्यालय में रात बिताएँगे।

बादशाह औरंगज़ैब आलमगीर रहमतुल्लाह अलैह ने एक हिंदू बेटी की इज़्ज़त के खातिर अपने सेनापति का क्या हश्र किया था

शौकत अली चेची तुगलपुर ग्रेटर नोएडा
तारीख की किताब से एक वाकिया और सुन लीजिए और देखिये किस तरह बादशाह औरंगज़ैब आलमगीर रहमतुल्लाह अलैह ने एक हिंदू बेटी की इज़्ज़त के खातिर अपने सेनापति का क्या हश्र किया था बेशक आज के हुक्मरान औरंगज़ेब आलमगीर रहमतुल्लाह अलैह के पैर की धूल भी नही हो सकते।


हज़रत औरंगजेब आलमगीर की हुकूमत
में काशी बनारस में एक पंडित की लड़की थी जिसका नाम शकुंतला था, उस लड़की को एक मुसलमान जाहिल सेनापति ने अपनी हवस का शिकार बनाना चाहा, और उसके बाप से
कहा के तेरी बेटी को डोली में सजा कर मेरे महल पे 7 दिन में भेज देना….
पंडित ने यह बात
अपनी बेटी से कही, उनके पास कोई रास्ता नहीं था और पंडित से बेटी ने कहा के 1 महीने का वक़्त ले लो कोईभी रास्ता निकल जायेगा,
पंडित ने सेनापति से जाकर कहा कि, “मेरे पास इतने पैसेनहीं हैं के मैं 7 दिन में सजाकर लड़की
को भेज सकूँ, मुझे महीने का वक़्त दो.” सेनापति ने कहा “ठीक है! ठीक महीने के बाद भेज देना”
पंडित ने अपनी लड़की
से जाकर कहा “वक़्त मिल गया है अब” लड़की ने मुग़ल शहजादे का लिबास पहना औरअपनी
सवारी को लेकर दिल्ली की तरफ़ निकल गई, कुछ दिनों के बाद दिल्ली
पहुँची, वो दिन जुमे का दिन था, और जुमे के दिन हज़रत औरंगजेब आलमगीर नमाज़ के बाद जब मस्जिद से बहार निकलते तो लोग अपनी फरियाद एक चिट्ठी में लिख कर मस्जिद की सीढियों के दोनों तरफ़ खड़े रहतेहज़रत औरंगजेब आलमगीर वो चिट्ठियाँ उनके हाथ से लेते जाते, और फिर कुछ दिनों में फैसला (इंसाफ) फरमाते, वो लड़की (शकुंतला) भी इस क़तार में जाकर खड़ी हो गयी, उसके चहरे पे नकाब था,
और लड़के का लिबास (ड्रेस) पहना हुए थी, जब उसके हाथ से चिट्ठी लेने की बारी आई तब हज़रत औरंगजेब ने अपने हाथ पर एक कपडा डालकर उसके हाथ से चिट्ठी ली…तब वो बोली महाराज!
मेरे साथ यह नाइंसाफी क्यों? सब लोगों से आपने सीधे तरीके से चिट्ठी ली और मेरे पास से हाथों पर कपडा रख कर ? तब हज़रत औरंगजेब आलमगीर ने फ़रमाया के इस्लाम में ग़ैर मेहरम (पराई औरतों) को हाथ लगाना भी
हराम है।और मैं जानता हूँ तू लड़का नहीं लड़की है, शकुंतला बादशाह के साथ कुछ दिन तक ठहरी और अपनी फरियाद सुनाई, बादशाह हज़रत औरंगजेब आलमगीर ने उससे कहा “बेटी! तू लौट जा तेरी डोली सेनापति के महल पहुँचेगी अपने वक़्त पर ”
शकुंतला सोच में पड गयी के यह क्या? वो अपने घर लौटी और उसके बाप पंडित ने पूछा क्या हुआ बेटी? तो वो बोली एक ही रास्ता
था मै हिन्दोस्तान के बादशाह के पास गयी
थी, लेकिन उन्होंने भी ऐसा ही कहा कि डोली उठेगी, लेकिन मेरे दिल में
एक उम्मीद की किरण है, वो ये है के मैं जितने दिन वहाँ रुकी बादशाह ने मुझे 15 बार बेटी कह कर पुकारा था,और एक बाप अपनी बेटी की इज्ज़त नीलाम नहीं होने देगा।
फिर वह दिन आया जिस दिन शकुंतला की
डोली सजधज के सेनापति के महल पहुँची,
सेनापति ने डोली देख के अपनी अय्याशी की ख़ुशी फकीरों को पैसे लुटाना शुरू किया।
जब पैसे लुटा रहा था
तब एक कम्बल-पोश फ़क़ीर जिसने अपने चेहरे पे कम्बल ओढ रखा था,उसने कहा “मैं ऐसा-वैसा फकीर नहीं हूँ, मेरे हाथ में पैसे दे” उसने हाथ में पैसे दिए और उन्होंने अपने मुह से कम्बल हटाया तो सेनापति देखकर हक्का बक्का रह गया क्योंकि उस कंबल में कोई फ़क़ीर नहीं बल्कि हज़रत औरंगजेब आलमगीर खुद थे।
उन्होंने कहा के तेरा
एक पंडित की लड़की की इज्ज़त पे हाथ डालना मुसलमान हुकूमत पे दाग लगा सकता है, और आप हज़रत औरंगजेब आलमगीर ने इंसाफ फ़रमाया 4 हाथी मंगवाकर सेनापति के दोनों हाथ और पैर बाँध कर अलग अलग दिशा में हाथियों को दौड़ा दिया गया,और सेनापति को चीर दिया गया, फिर आपने पंडित के घर
पर एक चबूतरा था उस चबूतरे के पास दो रकात नमाज़ नफिल शुक्राने की अदा की, और दुआ कि के, “ऐ अल्लाह! मैं तेरा शुक्रगुजार हूँ, के तूने मुझे एक ग़ैर इस्लामिक लड़की की इज्ज़त बचाने के लिए, इंसाफ करने के लिए चुना।
फिर हज़रत औरंगजेब आलमगीर ने कहा बेटी! ग्लास पानी लाना, लड़की पानी लेकर
आई, तब आपने फ़रमाया कि: “जिस दिन दिल्ली में मैंने तेरी फरियाद सुनी थी उस दिन से मैंने क़सम खाई थी के जब तक तेरे साथ इंसाफ नहीं होगा पानी नहीं पिऊंगा ”
तब शकुंतला के बाप और काशी बनारस के दूसरे हिन्दू भाइयों ने उस चबूतरे के पास एक मस्जिद तामीर की जिसका नाम “धनेडा
की मस्जिद” रखा गया, और पंडितों ने ऐलान किया के ये बादशाह औरंगजेब आलमगीर के इंसाफ की ख़ुशी में हमारी तरफ़ से इनाम है, और सेनापति को जो सजा दी गई वो इंसाफ़
एक सोने की तख़्त पर लिखा गया था जो आज
भी धनेडा की मस्जिद में मौजुद है।
हज़रत औरंगज़ेब काशी बनारस की एक ऐतिहासिक मस्जिद (धनेडा की मस्जिद) यह एक ऐसा इतिहास है जिसे पन्नो से तो हटा दिया गया है लेकिन निष्पक्ष इन्सान और हक़ परस्त लोगों के दिलो से चाहे वो किसी भी कौम का इन्सान हो मिटाया नहीं जा सकता, और क़यामत तक इंशा अल्लाह! मिटाया नहीं जा सकेगा।
अगर इतिहास की यह बात सच है तो बहुत सारी बातें सच हैं अगर लगता है यह बात गलत है तो इतिहास की बहुत सारी बातें गलत है क्योंकि इतिहास को इंसानों ने ही बनाया है
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