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अपनी संस्कृति में नारी और पुरूष की उत्पत्ति के मूल “अर्धनारीश्वर” को भूल गए। डॉ नीलम महेंद्र

भूल गए कि शिव के अर्धनारीश्वर के रूप में शिव पुरुष का प्रतीक हैं और शक्ति नारी का।
भूल गए कि प्रकृति अपने संचालन और नव सृजन के लिए शिव और शक्ति दोनों पर ही निर्भर है।

आधुनिक विचारों में हमारे कुछ मौलिक विचार कहीं खो गए
नारी, स्त्री, महिला वनिता,चाहे जिस नाम से पुकारो नारी तो एक ही है। ईश्वर की वो रचना जिसे उसने सृजन की शक्ति दी है, ईश्वर की वो कल्पना जिसमें प्रेम त्याग सहनशीलता सेवा और करुणा जैसे भावों से भरा ह्रदय है।
जो शरीर से भले ही कोमल हो लेकिन इरादों से फौलाद है।
जो अपने जीवन में अनेक किरदारों को सफलतापूर्वक जीती है।
वो माँ के रूप में पूजनीय है,
बहन के रूप में सबसे खूबसूरत दोस्त है बेटी के रूप में घर की रौनक है,
बहु के रूप में घर की लक्ष्मी है
और पत्नी के रूप में जीवन की हमसफर।
पहले नारी का स्थान घर की चारदीवारी तक सीमित था लेकिन आज वो हर सीमा को चुनौती दे रही है। चाहे राजनीति का क्षेत्र हो चाहे सामाजिक, चाहे हमारी सेनाएँ हों चाहे कारपोरेट जगत, आज की नारी हर क्षेत्र में सफलता पूर्वक दस्तक देते हुए देश की तरक्की में अपना योगदान दे रही है।
समय के साथ नारी ने परिवार और समाज में अपनी भूमिका के बदलाव को एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया है अपनी इच्छा शक्ति के बल पर सफल भी हुई लेकिन आज वो एक अनोखी दुविधा से गुजर रही है। आज उसे अपने प्रति पुरुष अथवा समाज का ही नहीं बल्कि उसका खुद का भी नजरिया बदलने का इंतजार है।
क्योंकी कल तक जो नारी और पुरुष एक दूसरे के पूरक थे, जो एक होकर एक दूसरे की कमियों को पूरा करते थे, जो अपनी अपनी कमजोरियों के साथ एक दूसरे की ताकत बने हुए थे, आज एक दूसरे से बराबरी की लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन यह समझ नहीं पा रहे कि इस लड़ाई में वे एक दूसरे को नहीं बल्कि खुद को ही कमजोर और अकेला करते जा रहे हैं।
आधुनिक समाज में नारी स्वतंत्रता महिला सशक्तिकरण महिला उदारीकरण जैसे भारी भरकम शब्दों के जाल में न केवल ये दोनों ही बल्कि एक समाज के रूप में हम भी उलझ कर रह गए हैं। इन शब्दों की भीड़ में हमारे कुछ शब्द, इन कल्पनाओं में हमारी कुछ कल्पनाएँ, इन आधुनिक विचारों में हमारे कुछ मौलिक विचार कहीं खो गए।
इस नई शब्दावली और उसके अर्थों को समझने की कोशिश मे हम अपने कुछ खूबसूरत शब्द और उनकी गहराई को भूल गए।
अपनी संस्कृति में नारी और पुरूष की उत्पत्ति के मूल “अर्धनारीश्वर” को भूल गए।
भूल गए कि शिव के अर्धनारीश्वर के रूप में शिव पुरुष का प्रतीक हैं और शक्ति नारी का।
भूल गए कि प्रकृति अपने संचालन और नव सृजन के लिए शिव और शक्ति दोनों पर ही निर्भर है।
भूल गए कि शिव और शक्ति अविभाज्य हैं।
भूल गए कि शिव जब शक्ति युक्त होता है, तो वह समर्थ होता है।
भूल गए कि शक्ति के अभाव में शिव शव समान है।
भूल गए कि शिव के बिना शक्ति और शक्ति के बिना शिव का कोई आस्तित्व ही नहीं है।
क्योंकि,
शिव अग्नि हैं तो शक्ति उसकी लौ हैं।
शिव तप हैं तो शक्ति निश्चय।
शिव संकल्प करते हैं तो शक्ति उसे सिद्ध करती हैं।
शिव कारण हैं तो शक्ति कारक हैं।
शिव मस्तिष्क हैं तो शक्ति ह्रदय हैं।
शिव शरीर हैं तो शक्ति प्राण हैं।
शिव ब्रह्म हैं तो शक्ति सरस्वती हैं।
शिव विष्णु हैं तो शक्ति लक्ष्मी हैं।
शिव महादेव हैं तो शक्ति पार्वती हैं।
शिव सागर हैं तो शक्ति उसकी लहरें।
जब प्रकृति का आस्तित्व ही अर्धनारीश्वर में है, पुरुष और नारी दोनों ही में है तो दोनों में अपने अपने आस्तित्व की लड़ाई व्यर्थ है।
इसलिए नारी गरिमा के लिए लड़ने वाली नारी यह समझ ले कि उसकी गरिमा पुरुष के सामने खड़े होने मे नहीं उसके बराबर खड़े होने में है। उसकी जीत पुरुष से लड़ने में नहीं उसका साथ देने में है। इसी प्रकार नारी को कमजोर मानने वाला पुरुष यह समझे कि उसका पौरुष महिला को अपने पीछे रखने में नहीं अपने बराबर रखने में है। उसका मान नारी को अपमान नहीं सम्मान देने में है। उसकी महानता नारी को अबला मानने में नहीं उसे सम्बल देने में है।
इसी प्रकार नारी को एक संघर्षपूर्ण जीवन देने वाले समाज के रूप में हम सभी समझें कि नारी न सिर्फ हमारे परिवार की या समाज की बल्कि वो सृष्टि की जीवन धारा को जीवित रखने वाली नींव है।

विवादित बयान इत्तेफाक या साज़िश-डाँ नीलम महेंद्र

वैसे तो शशि थरूर और विवादों का नाता कोई नया नहीं है। अपने आचरण और बयानों से वे विवादों को लगातार आमन्त्रित करते आएँ हैं। चाहे जुलाई 2009 में भारत पाक के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और युसुफ रजा गिलानी के बीच हुई बातचीत के बाद जारी संयुक्त वक्तव्य को बस कागज का एक टुकड़ा जिसका कोई खास महत्व नहीं है, कहने वाला बयान हो। चाहे इसी साल सितंबर में उनके अपने अधिकारिक निवास की जगह एक फाइव स्टार होटल जिसका खर्च करीब 40000 रुपये प्रतिदिन हो, में रहने का विवाद हो। चाहे जब दुनिया मंदी के दौर से गुजर रही हो और सरकारी खर्च में कटौती करने के उद्देश्य से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की पार्टी नेताओं से फ्लाइट की इकोनोमी कलास में सफर करने की अपील पर व्यंग्य करते हुए इसे कैटल कलास यानी भेड़ बकरियों की क्लास कहना हो। चाहे गाँधी जयंती की छुट्टी का विरोध करना हो। चाहे प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ करना हो। चाहे संसद न चलने देने के कांग्रेस के रुख़ से असहमति रखना हो। चाहे पत्नी सुनंदा पुष्कर की मौत हो। या फिर पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार के साथ अफेयर की खबरें हों।

या फिर सबसे ताजा “हिन्दू पाकिस्तान” के बयान वाला विवाद हो।
लेकिन इस बयान पर बात करने से पहले हमारे लिए यह जानना भी जरूरी है कि पिछले साल इन्होंने अपनी किताब इन्ग्लोरियस एम्पायर के सिलसिले में ब्रिटेन के टीवी चैनलों को दिए अपने इंटरव्यू से लाखों लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया था। इसमें उन्होंने कहा था कि ब्रिटेन की समृद्धि में भारत जैसे उपनिवेशों की लूट का बहुत बड़ा योगदान है। जाहिर है उनके इस बयान से इनकी यह पुस्तक लोगों में चर्चा का विषय बनी।
और अब हाल ही में इन्होंने “वाय आई ऐम ए हिन्दू” यानी मैं हिन्दू क्यों हूँ इस विषय पर एक पुस्तक लिखी है जिसमें उन्होंने संघ और बीजेपी के हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा पर निशाना साधा है।
आइए अब इनके ताजा बयान या फिर विवाद पर बात करते हैं।
शशि थरूर का कहना है कि अगर बीजेपी दोबारा लोकसभा चुनाव जीतती है तो भारत “हिन्दू पाकिस्तान” बन जाएगा। अल्पसंख्यकों को मिलने वाली “बराबरी” खत्म कर दी जाएगी। वो संविधान के बुनियादी सिद्धांतों को तहस नहस करके एक नया संविधान लिखेंगे जो कि हिन्दू राष्ट्र के सिद्धांतों पर आधारित होगा। उन्होंने आगे कहा कि यह वो भारत नहीं होगा जिसके लिए महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद और बाकी स्वतंत्रता सेनानियों ने संघर्ष किया था।
अगर किताब का विषय और इनका यह ताजा
बयान महज इत्तेफाक है, तो यह वाकई एक बेहद खूबसूरत इत्तेफाक है। और अगर यह सुनन्दा पुष्कर की मौत के चार साल बाद दिल्ली पुलिस द्वारा दायर चार्ज शीट का परिणाम है तो दुरभाग्यजनक है।
खैर जैसा कि होता आया है, कांग्रेस ने थरूर के इस बयान से तत्काल ही किनारा कर लिया।
कांग्रेस की स्थिति तो आज ऐसी है कि गैरों में कहाँ दम था, हमें तो अपनों ने लूटा,हमारी कश्ती वहाँ डूबी जहाँ पानी कम था। पहले मणिशंकर अय्यर और अब शशिथरूर। इसलिए उसके पास इन नेताओं और उनके बयानों से खुद को किनारे करने के अलावा कोई चारा बचता भी नहीं है।
क्योंकि आज कांग्रेस की डूबती नैया पर सवार ये नेता खुद को और अपनी पहचान को बचाने में इस प्रकार की बयानबाजी करके जहाँ कांग्रेस के लिए नई नई मुश्किलें खड़ी कर देते हैं वहीं भाजपा के दोनों हाथों में लड्डू थमा देते हैं।
रही थरूर के हिन्दू पाकिस्तान के बयान की बात तो यह जो नई शब्दावली इन्होंने गढ़ी है उसकी नींव ही कमजोर है। क्योंकि जिस शब्द में “हिन्दू” शब्द जुड़ जाता है वो स्वयं ही बन्धन मुक्त हो जाता है। न तो उसे किसी सीमा में बाँधा जा सकता है न किसी एक विचार में । क्योंकि हिन्दू होना हमें यह आजादी देता है कि हम ईश्वर को मानें या ना मानें फिर भी हम हिन्दू हो सकते हैं, हम मूर्ति पूजा करें या न करें फिर भी हम हिन्दू हो सकते हैं, हम ईश्वर को किसी भी रूप में देखें या फिर न भी देखें फिर भी हम हिन्दू हो सकते हैं हम मन्दिर जाएं या न जाएं फिर भी हम हिन्दू हो सकते हैं। हम व्रत उपवास करें या ना करें फिर भी हम हिन्दू हो सकते हैं। हम सिख हो कर भी हिन्दू हैं हम जैन होकर भी हिन्दू हैं।
क्योंकि हमें बताया गया है कि एक महाज्ञानी पंडित भी रावण बन सकता है और एक डाकू भी रामायण लिख सकता है। क्योंकि हमें बताया गया है कि जन्म नहीं कर्म महान होता है। इसलिए इस देश के हर आदमी की पहचान उसके देशहित या देशविरोधी कर्मों से ही होगी किसी अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक परिवार में जन्म लेने से नहीं।
इस देश की मिट्टी में, हवा में, पानी में वो बात है, इस देश के हर शख्स में वो जज्बात हैं कि किसी भी सूरत में यह देश हिन्दू पाकिस्तान बन ही नहीं सकता यह हर हाल में हिन्दू हिन्दुस्तान था, है और हमेशा ही रहेगा। शायद इसीलिए
” यूनान मिस्र व रोमा सब मिट गए जहाँ से
कुछ बात ऐसी है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।”

अब हमें जागना ही होगा, अपनी भावी पीढ़ियों के लिए, इस समाज के लिए-डॉ नीलम महेंद्र

हममें से हरेक को अपनी अपनी जिम्मेदारी निभानी ही होगी एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए।
हम सभी को अलख जगानी होगी अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए।
और इसकी शुरूआत हमें अपने घर से खुद ही करनी होगी, उन्हें अच्छी परवरिश दे कर,उन में संस्कार डालकर, उनमें संवेदनशीलता, त्याग और समर्पण की भावना के बीज डाल कर, मानवता के गुण जगा कर।

Dr Neelam Mahendra
यह लड़ाई है अच्छाई और बुराई की
उच्चतम न्यायालय ने 9 जुलाई 2018 के अपने ताजा फैसले में 16 दिसंबर 2012 के निर्भया कांड के दोषियों की फाँसी की सजा को बरकरार रखते हुए उसे उम्र कैद में बदलने की उनकी अपील ठुकरा दी है।
दिल्ली का निर्भया कांड देश का वो कांड था जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। देश के हर कोने से निर्भया के लिए न्याय और आरोपियों के लिए फाँसी की आवाज उठ रही थी। मकसद सिर्फ यही था कि इस प्रकार के अपराध करने से पहले अपराधी सौ बार सोचे। लेकिन आज छ साल बाद भी इस प्रकार के अपराध और उसमें की जाने वाली क्रूरता लगातार बढ़ती जा रही है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार साल 2015 में बलात्कार के 34651, 2015 मे 38947 मामले दर्ज हुए थे। 2013 में यह संख्या 25923 थी। कल तक महिलाओं और युवतियों को शिकार बनाने वाले आज पाँच छ साल की बच्चियों को भी नहीं बख्श रहे। आंकड़े बताते हैं कि 2016 में पोँक्सो ऐक्ट के तहत 2016 में छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार के 64138 मामले दर्ज हुए थे।
अभी हाल ही की बात करें तो सूरत, कठुआ, उन्नाव, मंदसौर, सतना।
इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि आज हमारे समाज में बात सिर्फ बच्चियों अथवा महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों की नहीं है,
बात इस बदलते परिवेश में “अपराध में लिप्त” होते जा रहे हमारे बच्चों की है,
और बात इन अपराधों के प्रति संवेदनशून्य होते एक समाज के रूप में हमारी खुद की भी है।
क्योंकि ऐसे अनेक मामले भी सामने आते हैं जब महिलाएं धन के लालच में अथवा अपने किसी अन्य स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए कानून का दुरुपयोग करके पुरुषों को झूठे आरोपों में फँसांती हैं।
अभी हाल ही में एक ताजा घटना में भोपाल में एक युवती द्वारा प्रताड़ित करने पर एक मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाले युवक यश पेठे द्वारा आत्महत्या करने का मामला भी सामने आया है। वो युवती ड्रग्स की आदी थी और युवकों से दोस्ती कर के उन पर पैसे देने का दबाव बनाती थी।

कल तक क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले, आदतन अपराधी किस्म के लोग ही अपराध करते थे लेकिन आज के हमारे इस तथाकथित सभ्य समाज में पढ़े लिखे लोग और संभ्रांत घरों के बच्चे भी अपराध में संलग्न हैं।
ऐसा नहीं है कि अशिक्षा अज्ञानता गरीबी या मजबूरी के चलते आज हमारे समाज में अपराध बढ़ रहा हो। आज केवल एडवेन्चर या नशे की लत भी हमारे छोटे छोटे बच्चों को अपराध की दुनिया में खींच रही है।
इसलिए बात आज एक मानव के रूप में दूसरे मानव के साथ,
हमारे गिरते हुए आचरण की है,
हमारी नैतिकता के पतन की है,
व्यक्तित्व के गिरते स्तर की है,
मृत होती जा रही संवेदनाओं की है,
लुप्त होते जा रहे मूल्यों की है,
आधुनिकता की आड़ में संस्कारहीन होते जा रहे युवाओं की है,
स्वार्थी होते जा रहे हमारे उस समाज की है जो,
पर पीड़ा के प्रति भावना शून्य होता जा रहा है और
अपराध के प्रति संवेदन शून्य,
बात सही और गलत की है,
बात अच्छाई और बुराई की है।
बात हम सभी की अपनी अपनी “व्यक्तिगत” जिम्मेदारियों से बचने की है,
एक माँ के रूप में“
एक पिता के रूप में“`
एक गुरु के रूप में
एक दोस्त के रूप में
एक समाज के रूप में।
बात अपनी “व्यक्तिगत जिम्मेदारियों” को ” “सामूहिक जिम्मेदारी” बनाकर बड़ी सफाई से दूसरों पर डाल देने की है,
कभी सरकार पर, तो `कभी कानून पर।
लेकिन यह भूल जाते हैं कि सरकार कानून से बंधी है, कानून की आँखों पर पट्टी बंधी है और हमने अपनी आँखों पर खुद ही पट्टी बांध ली है।
पर अब हमें जागना ही होगा, अपनी भावी पीढ़ियों के लिए, इस समाज के लिए, सम्पूर्ण मानवता के लिए,अपने बच्चों के बेहतर कल के लिए।
हममें से हरेक को अपनी अपनी जिम्मेदारी निभानी ही होगी एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए।
हम सभी को अलख जगानी होगी अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए।
और इसकी शुरूआत हमें अपने घर से खुद ही करनी होगी, उन्हें अच्छी परवरिश दे कर,उन में संस्कार डालकर, उनमें संवेदनशीलता, त्याग और समर्पण की भावना के बीज डाल कर, मानवता के गुण जगा कर।
क्योंकि यह लड़ाई है अच्छाई और बुराई की, सही और गलत की।
आज हम विज्ञान के सहारे मशीनों और रोबोट के युग में जीते हुए खुद भी थोड़े थोड़े मशीनी होते जा रहे हैं। टीवी इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया में जीते जीते खुद भी वर्चुअल होते जा रहे हैं।
आज जरूरत है फिर से मानव बनने की मानवता जगाने की

वो योग जो शरीर के भीतर प्रवेश करके मन और आत्मा का स्पर्श करता है वो आसनों से कहीं अधिक है।डॉ नीलम महेन्द्र

यम और नियम का पालन, प्राणायाम के द्वारा सांसों यानी जीवन शक्ति पर नियंत्रण,बाहरी वस्तुओं के प्रति त्याग,धारण यानी एकाग्रता,ध्यान अर्थात चिंतन और अन्त में समाधि द्वारा योग से मोक्ष प्राप्ति तक के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।

जीवन जीने की कला है योग
“योग स्वयं की स्वयं के माध्यम से स्वयं तक पहुँचने की यात्रा है, गीता ”

योग के विषय में कोई भी बात करने से पहले जान लेना आवश्यक है कि इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आदि काल में इसकी रचना, और वर्तमान समय में इसका ज्ञान एवं इसका प्रसार स्वहित से अधिक सर्व अर्थात सभी के हित को ध्यान में रखकर किया जाता रहा है।
अगर हम योग को स्वयं को फिट रखने के लिए करते हैं तो यह बहुत अच्छी बात है लेकिन अगर हम इसे केवल एक प्रकार का व्यायाम मानते हैं तो यह हमारी बहुत बड़ी भूल है।
आज जब 21 जून को सम्पूर्ण विश्व में योग दिवस बहुत ही जोर शोर से मनाया जाता है, तो आवश्यक हो जाता है कि हम योग की सीमाओं को कुछ विशेष प्रकार से शरीर को झुकाने और मोड़ने के अंदाज़, यानी कुछ शारीरिक आसनों तक ही समझने की भूल न करें।
क्योंकि इस विषय में अगर कोई सबसे महत्वपूर्ण बात हमें पता होनी चाहिए तो वह यह है कि योग मात्र शारीर को स्वस्थ रखने का साधन न होकर इस से कहीं अधिक है।
यह जीवन जीने की कला है,
एक पूर्ण चिकित्सा पद्धति है,
हमारे शास्त्रों में इसका अंतिम लक्ष्य मोक्ष है,
और उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यह एक पूर्ण मार्ग है, राजपथ।
दरअसल योग सम्पूर्ण मानवता को भारतीय संस्कृति की ओर से वो अमूल्य तोहफा है जो शरीर और मन, कार्य और विचार,संयम और संतुष्टि,तथा मनुष्य और प्रकृति के बीच एक सामंजस्य स्थापित करता है, स्वास्थ्य एवं कल्याण करता है।
यह हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है कि 2015 से हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के प्रयासों के परिणामस्वरूप 21 जून को विश्व के हर कोने में योग दिवस जोर शोर से मनाया जाता है।
यहाँ यह जानना भी रोचक होगा कि जब 2014 में यूनाइटेड नेशनस जनरल एसेम्बली में भारत की ओर से इसका प्रारूप प्रस्तुत किया गया था, तो कुल 193 सदस्यों में से इसे 177 सदस्य देशों का समर्थन इसे प्राप्त हुआ था। तब से हर साल 21 जून की तारीख ने इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए एक विशेष स्थान हासिल कर लिया।
लेकिन क्या हम जानते हैं कि भारतीय योग की पताका सम्पूर्ण विश्व में फैलाने के लिए 21 जून की तारीख़ ही क्यों चुनी गई? यह महज़ एक इत्तेफाक़ है या फिर इसके पीछे कोई वैज्ञानिकता है?
तो यह जानना दिलचस्प होगा कि 21 जून की तारीख़ चुनने के पीछे कई ठोस कारण हैं।
यह तो हम सभी जानते हैं कि उत्तरी गोलार्ध पर यह पृथ्वी का सबसे बड़ा दिन होता है, तथा इसी दिन से सूर्य अपनी स्थिति बदल कर दक्षिणायन होता है।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात, यह ही वो दिन था जब आदि गुरु भगवान शिव ने योग का ज्ञान सप्तऋषियों को दिया था। कहा जा सकता है कि इस दिन योग विद्या का धरती पर अवतरण हुआ था,और इसीलिए विश्व योग दिवस मनाने के लिए इससे बेहतर कोई और दिन हो भी नहीं सकता था।
जब 2015 में भारत में पहला योग दिवस मनाया गया था तो प्रधानमंत्री मोदी और 84 देशों के गणमान्य व्यक्तियों ने इसमें हिस्सा लिया था और 21 योगासन किए गए थे जिसमें 35985 लोगों ने एक साथ भाग लिया था।
लेकिन इन सारी बातों के बीच हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब हम कहते हैं कि योग केवल शरीर ही नहीं मन और आत्मा का शुद्धिकरण करके हमें प्रकृति, ईश्वर और स्वयं अपने नजदीक भी लाता है, तो यह भी जान लें कि ‘योगासन’, “अष्टांग योग” का एक अंग मात्र है।
वो योग जो शरीर के भीतर प्रवेश करके मन और आत्मा का स्पर्श करता है वो आसनों से कहीं अधिक है।
उसमें यम और नियम का पालन, प्राणायाम के द्वारा सांसों यानी जीवन शक्ति पर नियंत्रण,बाहरी वस्तुओं के प्रति त्याग,धारण यानी एकाग्रता,ध्यान अर्थात चिंतन और अन्त में समाधि द्वारा योग से मोक्ष प्राप्ति तक के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो देश सदियों से योग विद्या का साक्षी रहा है उस देश के अधिकांश युवा आज आधुनिक जीवन शैली और खान पान की खराब आदतों के कारण कम उम्र में ही मधुमेह और ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों का शिकार है। लेकिन अच्छी बात यह है कि योग को अपनी दिनचर्या में शामिल करके, अपनी जीवन शैली का हिस्सा बनाके,न सिर्फ इन बीमारियों से जीता जा सकता है।बल्कि स्वयं को शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों में स्वस्थ रखा जा सकता है।
और किसी भी देश के लिए इससे बेहतर कोई सौगात नहीं हो सकती कि उसके युवा स्वास्थ्य, स्फूर्ति,जोश और उत्साह से भरे हों।
तो आगे बढ़िए, योग को अपने जीवन में शामिल करिए और देश की तरक्की में अपना योगदान दीजिए।

देश में लगभग 150 धर्मो के मानने वाले लोग हैं किसी भी धर्म में सहनशीलता इंसानियत मान मर्यादा का उल्लंघन नहीं बताया | चौधरी शौकत अली चेची

राष्ट्रीय लोकदल के किसान प्रकोष्ठ पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष चौधरी शौकत अली चेची ने रमजान के बाद ईद उल फितर त्यौहार मनाने का महत्व इस्लाम धर्म के पांच अरकान यानी स्तंभ पहला कलमा तय्यब यानि नहीं कोई दूसरा माबूद सिवा अल्लाह ताला के दूसरा हर रोज नमाज कायम रखना तीसरा जकात यानी गरीबों को दान देना व उनका हक अदा करना चौथा माह रमजान व सवाल का दसवें महीने की पहली तारीख को ईद उल फितर का त्यौहार मनाते हैं जिसमें

मुस्लिम को फितरा देना वाजिब है अगर किसी ने फितरा नहीं दिया तो यानी टैक्स कहना भी गलत नहीं माना जा सकता तो वह नाजरीन ईद उल फितर मनाने का हकदार नहीं है रमजान में तराबी पढ़ना सुन्नत माना गया है यानि जिसको ओवरटाइम भी कहना गलत नहीं है रमजान का महीना रहमत व बरकत वाला साल का सबसे अहम माना जाता है सभी मुस्लिम समाज के लोग देश दुनिया की तरक्की तथा अमन चैन कि अल्लाह ताला से दुआ मांगते हैं जो बहुत जल्दी इस पाक महीने मैं कुबूल होती है और गुनाह माफ होते हैं नबी के संदेशो पर चलने की तौफीक अता फरमाने की पहल करते हैं जो सच्चाई और नेकी का रास्ता कहा जाता है इस मुकद्दस महीने से हर मुस्लिम गुन्हा से तोबा करता है और सभी के लिए दुआ में द्वेष भावना को भुलाकर अमन चैन तरक्की भाईचारा कायम रहे यही दुआ करता है व कहते हैं कि इस्लाम यही सिखाता है एक साथ मिलकर नमाज पढ़ना और एक साथ मिलकर अख्तियारी करना सबसे ज्यादा शबाब माना जाता है जिससे प्यार व भाई चारा पैदा होता है इसके बाद ईद पर हमारे सभी साथी सभी धर्म के लोग एक दूसरे से गले मिलकर और एक दूसरे के साथ पकवान मिठाइयां आदि खा पीकर यह संदेश देते हैं कि हम सभी एक हैं जाति धर्म तो हम सभी की पहचान है वैसे तो हमारे देश में लगभग 150 धर्मो के मानने वाले लोग हैं किसी भी धर्म में सहनशीलता इंसानियत मान मर्यादा का उल्लंघन नहीं बताया मगर हर धर्म ग्रंथ के अंदर एक अच्छी सोच छुपी होती है तथा त्यौहारों के माध्यम से गलत रास्ते पर इंसान भटकना जाए साल में हजारों त्योहारों को हमारे पूर्वजों ने मनाने का तरीका और संदेश दिया है जो हम सभी को सच्चाई तरक्की भाईचारा एक दूसरे के सहारे बगैर कुछ नहीं हर धर्म के त्योहारों में धर्म ग्रंथों में दर्शाया गया है सभी त्यौहार बारी- बारी से हर साल अपने समय पर इन्हें मनाने का मौका मिलता है जिसमें माह रमजान ईद उल फितर त्यौहार को दुनिया में हम माना गया है सभी देशवासियों यार रिश्तेदार परिचितो को दिल की गहराइयों से पवित्र माहे रमजान ईद उल फितर त्यौहार की दिल की गहराइयों से मुबारक व.हार्दिक बधाई

व्यक्ति अपनी जीवन लीला भले ही समाप्त कर लेता है लेकिन जाते जाते कई सवालों को जन्म दे जाता है।डॉ नीलम महेंद्र

बहुत कुछ बता गए जाते जाते
भैयूजी महाराज जैसा व्यक्तित्व जिसे राष्ट्र संत की उपाधि दी गई हो,
जिसके पास देश भर में लाखों अनुयायीयों की भीड़ हो,

इस भीड़ में आम लोगों से लेकर खास शख़सियतें भी शामिल हों,
इन शख़सियतों में केवल फिल्म जगत या व्यापार जगत ही नहीं सरकार बनाने वाले राजनैतिक दल से लेकर विपक्षी दलों तक के नेता शामिल हों,
इससे अधिक क्या कहा जाए कि इनसे सम्पर्क रखने वाली शख्सियतों में देश के प्रधानमंत्री भी शामिल हों,

लेकिन वो खुद संतों की सूची में अपनी सबसे जुदा शख्सियत रखता था,
जी हाँ भैयू जी महाराज ,वो शख़्स, जो आध्यात्म और संतों की एक नई परिभाषा गढ़ने निकला था,
कदाचित इसीलिए वो खुद को एक गृहस्थ भी और एक संत भी कहने की हिम्मत रखता था,
शायद इसीलिए वो मर्सिडीज जैसी गाड़ियों से परहेज नहीं करता था,
और रोलेक्स जैसी घड़ियों के लिए अपने प्रेम को छुपाता भी नहीं था,
क्योंकि उसकी परिभाषा में आध्यात्म की राह कर्म से विमुक्त होकर अर्थात सन्यास से नहीं अपितु कर्मयोगी बनकर यानी कर्म से होकर निकलती थी,
शायद इसीलिए जब इस शख्स से उसके आध्यात्मिक कार्यों की बात की जाती थी तो वो अपने सामाजिक कार्यों की बात करता था
वो ईश्वर को प्रकृति में, प्रकृति को जीवन में और जीवन को पेड़ों में देखता था
शायद इसीलिए उसने लगभग 18 लाख पेड़ लगवाने का श्रेय अपने नाम किया
शायद इसीलिए वो अपने हर शिष्य से गुरु दक्षिणा में एक पेड़ लगवाता था,
शायद इसीलिए वो ईश्वर को जीवन दायिनी जल में देखता था
शायद इसीलिए वो अपने आध्यात्म की प्यास जगहों जगहों अनेकों तालाब खुदवाकर बुझाता था
लेकिन जब एक ऐसा व्यक्ति आत्महत्या जैसा कदम उठाता है तो वो अपनी जीवन लीला भले ही समाप्त कर लेता है लेकिन जाते जाते कई सवालों को जन्म दे जाता है।
लेकिन साथ ही कई उत्तर भी दे जाता है समाज को जैसे कि अपने ईश्वर को किसी अन्य इंसान में मत ढूंढो क्योंकि ईश्वर तो एक ही है जो हम सबके भीतर ही है।

वो ईश्वर को इंसानों में देखने की कोशिश करता था शायद इसीलिए उसने महाराष्ट्र के पंडरपुर में रहने वाली वेश्याओं के 51 बच्चों को पिता के रूप में अपना नाम दिया था
शायद आध्यात्म उसके लिए वो बन्धन नहीं था जो उसे सांसारिक गतिविधियों से दूर करे बल्कि ये वो शक्ति थी जो उसे जिंदगी जी भर के जीने की आजादी देती थी,
शायद इसीलिए वो घुड़सवारी भी करता था तलवारबाजी भी करता था,
मोडलिंग भी करता था
और एक गृहस्थ संत बनके देश भर में अपने लाखों अनुयायी भी बना लेता था।
वो सबसे पहले चर्चा में तब आता है जब अन्ना हजारे का अनशन खत्म करने के लिए तत्कालीन यूपीए सरकार उन्हें अपना दूत बनाकर भेजती है और अन्ना उनके हाथों से जूस पीकर अपना अनशन समाप्त करते हैं।
प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में सदभावना उपवास पर बैठते हैं तो उनका उपवास खुलवाने के लिए इन्हें ही आमंत्रित किया जाता है।
वो उस मुकाम को हासिल करता है जब मध्य प्रदेश सरकार उसे राज्य मंत्री का दर्जा प्रदान करती है, हालांकि वो उसे ठुकराने का जज्बा भी रखता था।
लेकिन जब एक ऐसा व्यक्ति आत्महत्या जैसा कदम उठाता है तो वो अपनी जीवन लीला भले ही समाप्त कर लेता है लेकिन जाते जाते कई सवालों को जन्म दे जाता है।
लेकिन साथ ही कई उत्तर भी दे जाता है समाज को जैसे कि अपने ईश्वर को किसी अन्य इंसान में मत ढूंढो क्योंकि ईश्वर तो एक ही है जो हम सबके भीतर ही है।
वो लोगों को यह संदेश दे जाता है कि दूसरों को शांति का संदेश देने वाला खुद भीतर से अशांत भी हो सकता है।
वो यह जतला जाता है कि दुनिया पर विजय पाने वाला कैसे अपनों से ही हार जाता है।
अपने इस कदम से वह यह सोचने को मजबूर कर जाता है कि वर्तमान समाज में जिन्हें लोग संत मानकर, उन्हें ईश्वर के करीब जानकर उन पर ईश्वर तुल्य श्रद्धा रखते हैं क्या वे वाकई ईश्वर के करीब होते हैं?
वे यह जता जाते हैं कि जो लोग एक ऐसे व्यक्ति के पास अपनी उलझनों के जवाब तलाशते चले आते हैं क्या वे इस बात को समझ पाते हैं कि कुछ उलझनें उसकी भी होती होंगी, जिनके उत्तर वो किससे पूछे खुद उसको भी नहीं पता होता।
हाँ यह बात सही है कि ऐसे व्यक्ति विलक्षण प्रतिभा के धनी होते हैं लेकिन यह भी तो सच है कि आखिर ये इंसान ही होते हैं।
हाँ ये बात सही है कि इनमें एक आम आदमी से ज्यादा गुण होते हैं लेकिन यह भी तो सच है कि कमजोरियां इनकी भी होती हैं।
लेकिन फिर भी ये समाज में अपने लिये एक ख़ास स्थान बनाने में इसलिए सफल हो जाते हैं क्योंकि अपनी कमजोरियों को ये अपनी प्रतिभा से छुपा लेते हैं और अपने अनुयायियों की संख्या को अपनी ताकत बनाने में कामयाब हो जाते हैं।
चूंकि हमारे देश के राजनैतिक दल इनकी इस ताकत को अपने वोटों में बदलना जानते हैं।
क्या इस तथ्य को नकारा जा सकता है कि ऐसे व्यक्तियों की लोकप्रियता बढ़ाने में राजनैतिक दलों का योगदान नहीं होता?
क्या अपनी लोकप्रियता के लिए ऐसे “संत” और वोटों के लिए हमारे राजनेता एक दूसरे के पूरक नहीं बन जाते?
नेताओं और संतों की यह जुगलबंदी हमारे समाज को क्या संदेश देती है?
इन समीकरणों के साथ भले ही धर्म का उपयोग करके राजनीति जीत जाती हो लेकिन नैतिकता हार जाती है।

Sanjay Dutt & Rahul Mittra call on CM UP Yogi Adityanath

Sanjay Dutt who’s shooting for his home production Prassthanam in Lucknow called on the CM today early morning accompanied by close friend & prominent producer Rahul Mittra. Principal Secretary Awneesh Awasthi, along with other top officials from the state were also present, along with NRI Jay Patel who discussed investment opportunities in the state.

Chilbila village , near Allahabad is the place where Sanju s maternal grandmother Jaddan Bibi came from and Sanju shared this with the CM and offered to adopt the village to which CM and Avneesh Awasthi immediately said yes. Apart from this filmmaker Rahul Mittra suggested a film festival in the state to further propagate art, culture & cinema in the state to which CM said bananas. The CM also urged Mittra & Sanjay to explore Bundelkhand for their upcoming films. Film institute, other social work in the state , apart from Sanju s upcoming biopic were the other areas of discussion. The meeting took place for 30 long minutes and the CM was reportedly in a great jovial mood discussing diverse issues and offering full support to the actor producer duo. Mittra was incidentally the first producer to get subsidy for his 2013 Saif Ali khan starrer Bullett Raja and was a star speaker at the recently concluded UP investors summit and is the producer of Sanjay Dutt’s upcoming Saheb Biwi aur Gangster 3 & Torbaaz.

द्रौपदी और कृष्ण; तब और अब| डॉ शशि धनगर…©®

द्रौपदी तब भी लड़ी थी अपने आत्मसम्मान के लिए…आज भी लड़ती है ! उसके सवालों का जबाब न तब था किसी के पास…न आज है ! लेकिन वो इतिहास है… उसके साहस और वाक्पटुता की हम प्रशंसा तो करते हैं…लेकिन आज जब कोई ऐसे सवाल उठाता है, तो हमने ऐसे-ऐसे शब्द गढ़ रखे हैं, कि इतिहास भी सोचे कि काश उसे ये शब्द आते होते तो द्रौपदी इतनी मुखर न हो पाती…इतना शर्मिंदा तो न होना पड़ता भरी सभा में…जहाँ एक से एक शक्तिशाली पुरुषों को द्रौपदी के सामने निशब्द होना पड़ा था…!

स्त्रीवादी, त्रियाचरित्र और जाने ऐसे कौन-कौन से शब्द हैं, जिन्हें बोलने में ही आत्मा छलनी होने लगती है…लेकिन आश्चर्य की बात ये है, कि पुरुषों के लिए ऐसे किसी भी शब्द का निर्माण क्यों नहीं किया गया…जो उनकी गलत मानसिकता और पाशविक व्यवहार को चरितार्थ करते…क्योंकि इंसान तो वो भी हैं, तो गलत प्रवृतियाँ तो उनमें भी होंगी हीं…जो तुलनात्मक रूप से कहीं ज्यादा ही हैं, स्त्री की अपेक्षा ! लेकिन फिर वही १०० टके की बात कि ऐसे शब्द गढ़ने वाले, उनको प्रश्रय देने वाले, और उनका गाहे-बगाहे प्रचार करने वाले…हैं तो सब पुरुष ही न, वो कैसे और क्यों अपने लिए गलत शब्दावली को बढावा देंगे…?
हाँ कुछ तटस्थ और सही-गलत की परिभाषा का सही और तार्किक मापन करने वाले लोग हर युग और समाज में रहे हैं, जो सभी के साथ प्रासंगिक व्यवहार को प्राथमिकता देते हैं ! लेकिन ऐसे लोगों का समाज की मुख्य धारा के लोगों ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बहिष्कार ही किया है…और उनके लिए भी कुछ शब्द गढ़ लिए गए हैं…जैसे मुख्य प्रचलित जोरू का गुलाम और नामर्द या नपुंसक !
महाभारत द्रौपदी के एक वाक्य के कारण हुआ [अंधे का पुत्र अँधा] ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है आज भी…? अर्थात महाभारत का कारण दुर्योधन की राज्य हड़पने की लालसा नहीं थी…? धृतरास्ट्र का पुत्र-प्रेम नहीं था…? कृष्ण की कुटिलता नहीं थी…? युधिष्टर की जुआ खेलने की लत नहीं थी…? और आज भी वही होता है, बलात्कार का कारण पुरुषों की गलत मानसिकता न होकर, स्त्री का मुखर होना होता है [भंवरी कांड]…लड़की के छोटे कपडे होते हैं,..रात को बाहर निकलना होता है [दामिनी कांड]…और हाँ कई बार तो कारण बताना भी जरूरी नहीं [गुडिया कांड] !
बलात्कार तो वीभत्स है ही, लेकिन रोजमर्रा की ज़िंदगी में मानसिक बलात्कार परिवार में ही होता है, क्योंकि कुछ उनके साथ गलत हो… तो जिम्मेदार वही हैं यहाँ तक चाहे उनके साथ हिंसा हुई हो… कारण वो खुद ही हैं…ऐसा क्यों…? यही तो शिक्षा मिलती है…हमें अपनी परम्पराओं में…ढेरों आदर्श भरे पड़े हैं…वेद-पुराणों में, कि कैसे स्त्रियाँ अपना सर्वस्व न्योछावर कर देतीं थी…कैसे किसी भी अत्याचार के खिलाफ उफ़ भी नहीं करतीं थीं…तो या तो वही आदर्श अपनाओ या तैयार रहो अपनी दुर्दशा के लिए !
और हम सब इतने भक्त हैं अपनीं परम्पराओं के…कि गलत को गलत कहने का साहस नहीं रखते…कोई दूसरा कहे भी तो उसे असामाजिक करार कर दो…दवाब इतना जबरदस्त है होता है कि, स्वयं स्त्रियाँ भी यही सोचने को मजबूर हैं कि वे स्वयं जिम्मेदार हैं अपनी नारकीय स्तिथि के लिए …!
मेरे मन में हमेशा से ये सवाल उठता रहा है, कि कृष्ण ने ढेरों छल किये पांडवों को जिताने के लिए…उन्होंने सही-गलत की परिभाषा को कई बार तोडा-मरोड़ा अपने हिसाब से…चलो माना कि उनकी नज़र में वो धर्म के साथ थे…सत्य के साथ थे…तो व्यवहारिक रूप से छल करना उतना गलत नहीं था…लेकिन मुझे ये समझ नहीं आया कि उन्होंने द्रौपदी के आत्मसम्मान को बचाने के लिए कोई छल क्यों नहीं किया…? क्यों नहीं उन्होंने छल-बल से लोगों को मजबूर कर दिया कि वे द्रौपदी का दृष्टिकोण समझें…? कृष्ण ने करिश्मा दिखाकर द्रौपदी की लाज तो बचाई, लेकिन उन्होंने लोगों की मानसिकता क्यों नहीं बदली…? जबकि द्रौपदी हमेंशा धर्म के मार्ग पर थी…! वे चाहते तो कर सकते थे, लेकिन फिर वही…चाहते तो न…?
यदि तब कृष्ण ने लोगों को इस संदर्भ में भी गीता का ज्ञान दिया होता तो आज लोग वही अनुसरण करते…करिश्मा की उम्मीद में एक-दूसरे का मुंह न देखते..और जो उदाहरण होता, लोग आज भी मानते…तो आज लोग वही तो करते हैं, जो उन्होंने देखा है इतिहास में, अपने लिए लड़ना और ढेर सारे स्वाभिमान और स्वनिर्भर होने की बातें…लेकिन जब बात स्त्री की आये तो एक-दूसरे पर टालना…और हद हो तो स्वयं उसे ही जिम्मेदार ठहराना…कृष्ण ने गीता का ज्ञान दिया …दुनियां-जहां की बातें बतायीं…स्त्री की आत्मनिर्भरता का महत्व क्यों नहीं बताया…क्यों नहीं लोगों को उसका दृष्टिकोण समझने को प्रेरित किया..और परिणाम ये कि आज भी वही हो रहा है…जो कल हुआ था…!
अब सब हमारे ऊपर है…की हम करिश्मे की उम्मीद करें…या गलत होने दें…ज्यादा कुछ समझ न आये तो इतिहास ही उठा कर देखें…कि आखिरकार उस महाभारत से हासिल क्या हुआ…हमे विद्वान खोये, वीर खोये, विज्ञान और सभ्यता का तहस-नहस किया…आज तो कृष्ण भी नहीं आने वाले…? तो हम ही समझें कि कहाँ…किसका…और किस तरह…साथ देना है…? गलत-सही की परिभाषा को सबके लिए समान कर दें…तो फिर से हम इस प्रगति और विकास के नुकसान से बचा सकते हैं…और हाँ जो गलतियाँ हुई है, उनको सिरे से दूर करना होगा, अन्यथा अंत सुनिश्चित है…!

उप चुनाव के रिजल्ट से bjp के लिए अच्छा संकेत नहीं शौकत अली चेची

राष्ट्रीय लोकदल के किसान प्रकोष्ठ पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष चौधरी शौकत अली चेची कुछ मुख्य अंश प्रस्तुत जिन पर हम सभी देशवासियों को विचार करने की आवश्यकता है

30 , 5 , 2018 उप चुनाव के रिजल्ट से bjp के लिए अच्छा संकेत नहीं खासकर कैराना व नूरपुर 2019 चुनाव के लिए खतरे की घंटी बजनी शुरू हो गई केंद्र की गद्दी लगभग 150 किलोमीटर दूरी pm तथा cm दोनों रोड शो सभा करें कैराना ने सुर्खियां बटोरी थी दोनों ही bjp के कैंडिडेट सहानुभूति और नारी शक्ति फिर भी bjp कि कोई तिकड़म काम नहीं आई जिसमें मुख्य evm मशीन को लू की चपेट में आना रमजान में चुनाव करना आदि चुनाव जीतने के हथकंडे अपनाएं मगर महा गठबंधन की सूझ-बूझ ने अमित शाह मोदी योगी तीनो को धरा शाही करने में विपक्ष कामयाब रहा जीत हार का अंतर कैराना नूरपुर में कम ही रहा मगर विपक्षी पार्टियों को महा गठबंधन बनाने का जनता ने संकेत 2019 के लिए स्पष्ट दे दिए bjp को हराने के लिए देश की जनता बीजेपी को कम पसंद करती है मोदी जी को पसंद कर सत्ता शॉप दी मोदी जी के सारे वादे हवा हवाई हो गए जनता ऐसा महसूस कर रही है 4 साल का इंतजार बहुत लंबा होता है जिसमें मोदी जी ने महंगाई बेरोजगारी गुमराह जाति धर्म के नाम से नफ़रत इन चारों बातों के सिवा देश की जनता को कुछ नहीं दिया मगर लगभग देश की जनता को 10 साल पीछे धकेल दिया शायद bjp एक ऐसी पार्टी है जो गुमराह और नफरत फैलाकर देश में सत्ता हासिल करना चाहती है देश की जनता ने शायद महसूस किया है अच्छे दिन नहीं हैं देश जनता के बीजेपी में इसीलिए बहुत हो गया इंतजार 2019 में महा गठबंधन के माध्यम से bjp को कर देंगे सत्ता से बाहर हिंदू मुस्लिम सिख इसाई bjp ने आपसी भाईचारे में खटास लाई इन चारों ने आवाज़ लगाई सभी देशवासी मिलकर आओ भाई इन bjp वालों की चारपाई गंगा जी में फैको भाई 2019 चुनाव में पिछली सरकार लाओ यही समझ में आई डीजल पेट्रोल रसोई गैस देश के लिए तीनों मुख्य मुद्दे हैं जिसमें नोट बंदी जी sd आदि उल्लू जुनून कानून बना कर 103 योजना बनाकर एक गांव को सांसद का गोद लेना 4 साल में घुटनों पर अभी तक कुछ भी नहीं चला जबकि बच्चा पैदा होने के 1 साल बाद चलने लगता है गन्ने का बकाया भुगतान डबल हो गया सीमा का जवान देश का किसान सबसे ज्यादा परेशान है लाल किले को गिरवी रख दिया 11हजार करोड़ से ज्यादा विज्ञापन में मोदी जी ने खर्च कर दिया 5500 हजार करोड़ से ज्यादा विदेशी सैर सपाटा में खर्च कर दिया 45000 करोड़ से ज्यादा लोन लेकर विदेश भाग गए हजारों साल पहले इतिहास को तोड़ मरोड़ कर के जनता के सामने पेश कर पूरी तरह से गुमराह और नफरत की राजनीति के बीज बोये जा रहे हैं bjp की सहयोगी पार्टियां मलाई खाने के लिए bjp के साथ सत्ता में बैठी हैं जो जनता और देश की परेशानी को हल करने की कोई कोशिश नहीं कर रहे मां बाप औलाद के लिए भगवान का रुप होता है मगर मां बाप से अगर कोई भूल हो रही है तो औलाद मां बाप की गलती का विरोध करने में देर नहीं करते तो क्या bjp सहयोगी पार्टियां को सत्ता जाने का डर सता रहा है हम सभी देशवासी पिछली घटनाएं देश प्रदेश क्षेत्र जिला घर परिवार मैं इतिहास की या अन्य घटनाएं जो घट चुकी हैं उनको ताजा करने में नफरत गुमराह बर्बादी वाली बातों में दिलचस्पी नहीं है भूलने में ही भलाई है मगर bjp वालों ने मीडिया सोशल मीडिया whatsapp आदि के माध्यम से देश जनता को बर्बाद करने के लिए झंडा उठाए हौसले अपने बुलंद करने में जुटे हुए हैं आज के दौर में अच्छाई को छुपाने की कोशिश की जा रही है बुराई को उजागर करने की कोशिश की जा रही है मगर सच्चाई हमेशा छुपी नहीं रह सकती बुराई की बू एक दिन तूफान की तरह आती है जो बर्बाद करके चली जाती है बीजेपी के लिए देश की जनता ने इशारा दे दिया है विपक्षी पार्टियों को संकेत महा गठबंधन बनाकर 2019 चुनाव का दे दिया यह सारी बातें देश की जनता के बीच में सुर्खियां बनी हुई है हर जाति धर्म के लोग इन बातों पर चर्चा कर रहे हैं

काश कभी ऐसा हो…डॉ शशि धनगर©®


डॉ शशि धनगर©®
काश कभी ऐसा हो
निकलूँ मैं उसके घर को
और बरसात हो जाये !
शाम ढले जब वो आये
इन्द्रधनुष न हो तो भी
सब सतरंगी नज़र आये !
मैं तन्हा गर हो जाऊं
इस दुनिया की भीड़ में
चुपके से काँधे पे
तुम्हारा हाथ आ जाये !
क्या लगा तुम्हें..?
कि बावली हो गयी हूँ मैं
नहीं सब ठीक है
फिक्र मत करना !
मन है कहीं भी जा सकता है
ये किसी पर भी आ सकता है
इंतज़ार तो कर ही सकती हूँ
भले बरसात आये ना आये !