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महिला होना कुछ खास होता है। डॉ नीलम महेंद्र

अभी हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो जिसका शीर्षक था, ” रन लाइक अ गर्ल” अर्थात एक लड़की की तरह दौड़ो, काफी सराहा गया जिसमें 16- 28 साल तक की लड़कियों या फिर इसी उम्र के लड़कों से जब “लड़कियों की तरह” दौड़ने के लिए कहा गया तो लड़के तो छोड़िए लड़कियाँ भी अपने हाथों और पैरों से अजीब अजीब तरह के ऐक्शन करते हुए दौड़ने लगीं। कुल मिलाकर यह बात सामने आई कि उनके अनुसार “लड़कियों की तरह दौड़ने” का मतलब “कुछ अजीब तरीके से” दौड़ना होता है। लेकिन जब एक पाँच साल की बच्ची से पूछा गया कि अगर तुमसे कहा जाए कि लड़कियों की तरह दौड़ कर दिखाओ तो तुम कैसे दौड़ोगी? तो उसका बहुत ही सुन्दर जवाब था, “अपनी पूरी ताकत और जोश के साथ”।

मतलब साफ़ है कि एक पांच साल की बच्ची के लिए “दौड़ने” और “लड़कियों जैसे दौड़ने” में कोई अंतर नहीं है लेकिन एक व्यस्क लड़के या लड़की के लिए दोनों में बहुत फर्क है। यहाँ गौर करने वाले दो विषय हैं पहला यह कि बात केवल महिलाओं के प्रति समाज के नजरिये की ही नहीं है बल्की खुद महिलाओं की स्वयं अपने प्रति उनके खुद के नजरिये की है दूसरा यह कि यह नजरिया एक बच्ची में नहीं दिखता ।
21 वीं सदी में, आज जब हम केवल भारत ही नहीं बल्कि वैश्विक परिदृश्य पर वर्तमान की अपनी इस मानव सभ्यता को आंकते हैं तो निश्चित ही स्वयं को इतिहास में अब तक की सबसे विकसित सभ्यता होने का दर्जा देते हैं।
लेकिन फिर भी जब इस तथाकथित विकसित सभ्यता में लैंगिक समानता की बात आती है तो परिस्थितियां केवल भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व में बेहद निराशाजनक हैं।
क्योंकि बात दरअसल यह है कि आज भी महिलाओं को उनकी “योग्यता” के आधार पर नहीं,बल्कि उन्हें एक “महिला होने” के आधार पर ही आंका जाता है।
आज भी देखा जाए तो विश्व में कहीं भी महत्वपूर्ण और उच्च पदों पर महिलाओं की नियुक्ती न के बराबर है। और यह स्थिति दुनिया के लगभग हर देश में ही है क्योंकि खुद को एक ईकवीटेबल सोसायटी कहने वाला विश्व का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका भी आज तक अपने लिए एक महिला राष्ट्रपति नहीं चुन पाया है।
लेकिन बात केवल इतनी भर हो, ऐसा भी नहीं है बल्कि बात यह भी है कि जिन पदों पर महिलाओं की नियुक्ति की जाती है वहाँ भी उन्हें उसी काम के लिए पुरुषों के मुकाबले कम वेतन दिया जाता है। यहाँ शायद यह जानना रोचक होगा कि यह बात हाल ही में विश्व में महिलाओं की वर्तमान सामाजिक स्थिति से सम्बन्धित एक रिपोर्ट में सामने आई कि ब्रिटेन जैसे विकसित देश में भी कई बड़ी बड़ी कम्पनियों में महिलाओं को उसी काम के लिए पुरुषों के मुकाबले कम वेतन दिया जाता है।
तो अब जब इन तथाकथित उदार और मोर्डन सोसाइटीस में महिलाओं की यह स्थिति है तो भारत में हमारे लिए एक समाज के रूप में यह समझ लेना भी आवश्यक है कि इन देशों की “उदार और मार्डन” सोच केवल महिलाओं के कपड़ों और खान पान तक ही सीमित है। बात जब उनके प्रति दृष्टिकोण और आचरण की आती है तो इन तथाकथित उदारवादी संस्कृति वाले देशों में भी जेन्डर इनइक्वेलिटी यानी लैंगिक असमानता व्याप्त है।
लेकिन इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हमारे लिए यह एक संतोष का विषय न होकर एक गहन चिंतन का विषय होना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों है? और जब हम सोचेंगे तो पाएंगे कि दरअसल एक समाज के रूप में यह हमारी एक मानसिक स्थिति है जिसकी जड़ें काफ़ी गहरी हैं।
अब अगर इस सोच की जड़ों को खोजेंगे तो पाएंगे कि इस सोच के बीज अपने बच्चों में न सिर्फ हम खुद ही बोते हैं बल्कि उन्हें लगातार पोषित भी करते हैं। कैसे?
वो ऐसे कि बचपन से ही जब ये बच्चे कुछ समझने लायक हो जाते हैं तो हम उन्हें कहानियाँ सुनाते हैं और जब पढ़ने लायक हो जाते हैं तो इन्हें पुस्तकें पढ़ने के लिए देते हैं, और आपको शायद यह जान कर अजीब लगे लेकिन इन कहानियों के द्वारा ही अनजाने में हम इस मानसिकता के बीज अपने बच्चों के ह्रदय में डाल देते हैं, जैसे कि एक सुंदर और नाजुक सी राजकुमारी को एक राक्षस ले जाता है जिसकी कैद से उसे एक ताकतवर राजकुमार आकर बचाता है, हमारे बच्चों के मन में इस प्रकार की कहानियाँ किस मानसिकता के बीज बोते होंगे?
शायद अब हम समझ पा रहे हैं एक पांच साल की बच्ची और एक व्यस्क लड़के या लड़की की सोच के उस अन्तर को जो कि हमारे ही द्वारा डाला जाता है और कालांतर में समाज में भी दिखाई देता है।
इसलिए एक सभ्य एवं विकसित समाज के रूप में हमारे लिए यह समझना बेहद आवश्यक है कि केवल समाज ही नहीं बल्की महिलाओं को भी स्वयं अपने प्रति नजरिया बदलने की जरूरत है। सबसे पहली और सबसे अहम बात कि महिला होने का अर्थ अबला होना नहीं होता और न ही कुछ स्टीरियोटाइप होना होता है बल्कि महिला होना “कुछ खास” होता है, जो आप हैं जैसी आप हैं वैसे ही होना होता है, अपना सर्वश्रेष्ठ देना होता है और अपने आत्मबल से अपने प्रति समाज की सोच बदल देना होता है। स्वयं के एक स्त्री होने का जश्न मनाना होता है

हक़ था मेरा उस पल पर – डॉ शशि धनगर

हक़ था मेरा उस पल पर
ऐसे भी और वैसे भी…
ज़िन्दगी आयी हो सामने
फ़िर मेरे जैसे भी…।
कारवाँ गुज़रा था पूरा
ओ, मेरे जाने-जहाँ
उन दरख़्तों के दरमियाँ
तड़पेगा वो सैयाद
देखना ऐसे भी और वैसे भी…।
मौसम पलटते हैं
चाहे सदियों बाद ही सही
होते हैं बागवां गुलज़ार
चाहे कुछ गुलों के लिए ही…।
बस यही बची है आस
कि आएगा वो लेकर
मेरे हिस्से की उजास…
जिससे करती हूँ मैं अरदास
तब जाकर ही कहीं
सम्पूर्ण होगा ये जीवनचक्र
और फिर थम जाएगी ये साँस
ऐसे भी और वैसे भी…।।

डॉ शशि धनगर ©®

आ गया हिंदी-दिवस-डॉ शशि धनगर

और सबकी संदर्भित चिंताएं भी…कैसे हिंदी को बचाएं…और कैसे सम्मान दिलाएं..
14 सितम्बर (हिंदी- दिवस) पर विशेष
.ज्यादा कुछ नहीं करना है…बस स्वयं को मजबूत करें…स्वयं के लिए जीना सीख लें…क्योंकि बहुत कुछ है, जो हो रहा है हिंदी के विकास के लिए…आज भी सभी हिंदी-भाषी सोचते हिंदी में ही हैं…खुश होना, दुखी होना, आत्मविभोर होना जैसी मानव होने की सारी अनुभूतियाँ हिंदी में ही महसूस करते हैं….और रही बात समाज में सम्मान की…तो बहुत दूर तक रास्ते जा रहे हैं…ढेरों कवितायेँ…कहानियां…ग़ज़ल…मुक्तक…उपन्यास..

जैसी हिंदी लेखन की तमाम विधाएं राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लिखीं जा रहीं है…पढ़ीं जा रहीं हैं, और सराही जा रहीं हैं…! हिंदी फ़िल्में और गीत इतनी क्षमता रखते हैं…कि हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि से दूर-दूर तक रिश्ता न रखने वाले भाषा-भाषी लोग मेरे पास माँ है..का मतलब समझते हैं…!

जरूरत है खुद को सम्मानित करने की…कि हमे हिंदी बोलने में फ़क्र महसूस हो…और यह तभी होगा जब हम अपने कार्यक्षेत्र में निपुण हों…और अपना सर्वोतम दें…! अपने आप को स्वयं के लिए साबित करें…!
इंग्लिश एक अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है…उसे अपनाने में कोई बुराई नहीं है…क्योंकि वैश्विक स्तर पर उत्तरजीविता के लिए अनिवार्य सी हो गयी है…! इसलिए इंग्लिश सीखनी भी चाहिए…! क्योंकि इंग्लिश  बोलने वाले लोग जब हिंदी में बोलते हैं… तो लोग और अधिक अभिमान महसूस करते है…!
जब हम ख़ुद को अपने क्षेत्र में सर्वोपरि पाते हैं…खुद को समाज और परिवार में सम्मानित महसूस करते हैं…तो किसी भी प्रकार की हीनभावना नहीं पनपने पाती…! हाँ यही कारण है…कि अच्छी इंग्लिश बोलने वाले हिंदी बोलने में गर्वान्वित महसूस करते हैं …अन्यथा थोडा भी सोचें तो स्पष्ट हो जायेगा…कि कुछ लोग हिंदी में और अच्छी हिंदी बोलने के लिए ही विख्यात हैं…!
अर्थात भाषा का अपने-आप में सम्मान ज्यादा महत्व नहीं रखता…इससे जुड़े लोगों का आचरण और व्यवहार और उनकी समाज के प्रति जिम्मेदारियां निभाने की मानसिकता निर्धारित करती है…कि हिंदी का भविष्य क्या है…जो….निसंदेह उज्जवल है…क्योंकि लगभग १ अरब लोगों की सोच को शामिल किये बिना तो गूगल भी विकास नहीं कर सकता…इसीलिए आज ढेरों एप आ चुके हैं, जो हिंदी भाषी लोगों के मनोव्यवहारों को प्रदर्शित करने में प्रयत्नशील हैं…!
बस हम स्वयं को सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक और मानसिक रूप से मजबूत करें और सम्मान दें…बाकि हमसे जुडा परिवेश, भाषा और शैली स्वमेव ही प्रगति करेंगे…!

डॉ शशि धनगर

Youngest child – Name register in India Book of Records

New Delhi (today face.in news) Hindu Mythology is an important part of our culture. It plays a large role in the rituals followed in society, and seldom thinks it important to gain some knowledge of Hindu mythology or scripture but in today’s times most of the children are wasting their precious time over mobiles, TV or free play.
Holding a record for a series on Sundarkand
Exhibited a series of 35 paintings on a Hindu scripture Sundarkand
.

At the same time 12 years old, Ahmedabad, Gujarat Girl, Isha Majithia registered her name in India Book of Records 2018 edition as the youngest child in the country, who has done and exhibited a series of 35 paintings on a Hindu Scripture Sundarkand.
Isha began work on this project when she was 6 in October 2012 and completed it in March 2016. At the age of 10, Isha had presented her debut series in the world of arts. Isha has a great understanding of our cultural heritage and scriptures at a very young age. Isha’s efforts of encapsulating the story of scripture Sundarkand, the fifth chapter of Ramayana, in a series of 35 paintings are noted as exceptional. The material she uses is acrylic colors, crayons, ink, and charcoal on paper.
This is country’s first project that pictorially depicts a scripture and is undertaken by a young girl. Her series was exhibited in the city in September 2016. A short documentary on the making of the project and on the same day a book was released which was based on Isha’s work.
The picture book conceptualized and compiled by the young artist’s mom, Mrs. Priya Adhyaru-Majithia has the original text of Sundarkand and its translation in three languages – Gujarati, Hindi, and English, interspersed with Isha’s paintings.

देश देख रहा है -डॉ नीलम महेंद्र

आज राजनीति केवल राज करने अथवा सत्ता हासिल करने मात्र की नीति बन कर रह गई है उसका राज्य या फिर उसके नागरिकों के उत्थान से कोई लेना देना नहीं है। यही कारण है कि आज राजनीति का एकमात्र उद्देश्य अपनी सत्ता और वोट बैंक की सुरक्षा सुनिश्चित करना रह गया है न कि राज्य और उसके नागरिकों की सुरक्षा।

कम से कम असम में एनआरसी ड्राफ्ट जारी होने के बाद कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया तो इसी बात को सिद्ध कर रही है। चाहे तृणमूल कांग्रेस हो या सपा, जद-एस, तेलुगु देसम या फिर आम आदमी पार्टी।
“विनाश काले विपरीत बुद्धि:” शायद इसी कारण यह सभी विपक्षी दल इस बात को भी नहीं समझ पा रहे कि देश की सुरक्षा से जुड़े ऐसे गंभीर मुद्दे पर इस प्रकार अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकना भविष्य में उन्हें ही भारी पड़ने वाला है। क्योंकि वे यह नहीं समझ पा रहे कि इस प्रकार की बयानबाजी करके ये देश को केवल यह दर्शा रहे हैं कि अपने स्वार्थों को हासिल करने के लिए ये लोग देश की सुरक्षा को भी ताक में रख सकते हैं।

क्योंकि आज जो काँग्रेस असम में एनआरसी का विरोध कर रही है वो सत्ता में रहते हुए पूरे देश में ही एनआरसी जैसी व्यवस्था चाहती थी। जी हाँ 2009 में, यूपीए के शासन काल में उनकी सरकार में तत्कालीन गृहमंत्री चिदंबरम ने देश में होने वाली आतंकवादी गतिविधियों की रोकथाम के लिए इसी प्रकार की एक व्यवस्था की सिफारिश भी की थी। उन्होंने एनआरसी के ही समान एनपीआर अर्थात राष्ट्रीय जनसंख्या रिजिस्टर की कल्पना करते हुए 2011 तक देश के हर नागरिक को एक बहु उद्देश्यीय राष्ट्रीय पहचान पत्र दिए जाने का सुझाव दिया था ताकि देश में होने वाली आतंकवादी घटनाओं पर लगाम लग सके।
यही नहीं इसी कांग्रेस ने 2004 में राज्य में 1.2 करोड़ अवैध बांग्लादेशी होने का अनुमान लगाया था। वह भी तब जब आज की तरह भारत में रोहिंग्या मुसलमानों की घुसपैठ नहीं हुई थी। लेकिन खुद उनके द्वारा घुसपैठियों की समस्या को स्वीकार करने के बावजूद आज उन लोगों के अधिकारों की बात करना जो कि इस देश का नागरिक होने के लिए जरूरी दस्तावेज भी नहीं दे पाए, उनका यह आचरण न तो इस देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी के नाते उचित है और न ही इस देश के एक जिम्मेदार विपक्षी दल के नाते। क्योंकि क्या ये अपने इस व्यवहार से यह नहीं जता रहे कि इन संदिग्ध 40 लाख लोगों के अधिकारों के लिए, जो कि इस देश के नागरिक हैं भी कि नहीं, यह ही नहीं पता, इन सभी विपक्षी दलों का वोट बैंक हैं ? यह समस्या देश की सुरक्षा की नजर से बहुत ही गंभीर है क्योंकि इस बात का अंदेशा है कि नौकरशाही के भ्रष्ट आचरण के चलते ये लोग बड़ी आसानी से अपने लिए राशन कार्ड, आधार कार्ड और वोटर कार्ड जैसे सरकारी दस्तावेज हासिल कर चुके हों। शर्म का विषय है कि हमारे राजनैतिक दल इस देश के 2.89 करोड़ लोगों के अधिकारों से ज्यादा चिंतित गैर कानूनी रूप से रह रहे 40 लाख लोगों के अधिकारों के लिए हैं।
ममता बैनर्जी ने तो दो कदम आगे बढ़ते हुए देश में गृहयुद्ध तक का खतरा जता दिया है ।अभी कुछ दिनों पहले सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने भी एक कार्यक्रम में असम में बढ़ रही बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर बयान दिया था जो इस बात को पुख्ता करता है कि यह मुद्दा राजनैतिक नहीं देश की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।
खास तौर पर तब जब असम में बाहरी लोगों का आकर बसने का इतिहास बहुत पुराना हो। 1947 से भी पहले से। लेकिन यह सरकारों की नाकामी ही कही जाएगी कि 1947 के विभाजन के बाद फिर 1971 में बांग्लादेश बनने की स्थिति में भी और आज तक भारी संख्या में बांग्लादेशियों का असम में गैरकानूनी तरीके से आने का सिलसिला लगातार जारी है। यही कारण है कि इस घुसपैठ से असम के मूलनिवासियों में असुरक्षा की भावना जागृत हुई जिसने 1980 के दशक में एक जन आक्रोश और फिर जन आन्दोलन का रूप ले लिया। खास तौर पर तब जब बड़ी संख्या में बांग्लादेश से आने वाले लोगों को राज्य की मतदाता सूची में स्थान दे दिया गया। आंदोलन कारियों का कहना था कि राज्य की जनसंख्या का 31-34% गैर कानूनी रूप से आए लोगों का है। उन्होंने केन्द्र से मांग की कि बाहरी लोगों को असम में आने से रोकने के लिए सीमाओं को सील किया जाए और उनकी पहचान कर मतदाता सूची में से उनके नाम हटाए। आज जो राहुल एनआरसी का विरोध कर रहे हैं वे शायद यह भूल रहे हैं कि उनके पिता, तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व राजीव गांधी ने 15 अगस्त 1985 को आन्दोलन करने वाले नेताओं के साथ असम समझौता किया था जिसके तहत यह तय किया गया था कि 1971 के बाद जो लोग असम में आए थे उन्हें वापस भेज दिया जाएगा।
इसके बाद समझौते के आधार पर मतदाता सूची में संशोधन करके विधानसभा चुनाव कराए गए थे।
इसे सत्ता का स्वार्थ ही कहा जाएगा कि जिस असम गण परिषद के नेता प्रफुल्ल कुमार महंत इसी आन्दोलन की लहरों पर सवार हो कर दो बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। जो प्रफुल्ल कुमार महंत आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले मुख्य संगठन आल असम स्टूडेन्ट यूनियन के अध्यक्ष भी थे वो भी राज्य का मुख्यमंत्री रहते हुए इस समस्या का समाधान करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाने की हिम्मत नहीं दिखा पाए।
और इसे क्या कहा जाए कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है और उसके आदेश पर उसकी निगरानी में एनआरसी बनता है तो विपक्षी दल एकजुट तो होते हैं लेकिन देश के हितों की रक्षा के लिए नहीं बल्कि अपने अपने हितों की रक्षा के लिए।
वे एक तो होते हैं लेकिन देश की सुरक्षा को लेकर नहीं बल्कि अपनी राजनैतिक सत्ता की सुरक्षा को लेकर।
और अगर वे समझते हैं कि देश की जनता मूर्ख है, तो वे नादान हैं क्योंकि देश लगातार सालों से उन्हें देख रहा है।
देश देख रहा है कि जब बात इस देश के नागरिकों और गैर कानूनी रूप से यहाँ रहने वालों के हितों में से एक के हितों को चुनने की बारी आती है तो इन्हें गैर कानूनी रूप से रहने वालों की चिंता सताती है।
देश देख रहा है कि इन घुसपैठियों को यह “शरणार्थी” कह कर इनके “मानवाधिकारों” की दुहाई दे रहे हैं लेकिन अपने ही देश में शरणार्थी बनने को मजबूर कश्मीरी पंडितों का नाम भी आज तक अपनी जुबान पर नहीं लाए।
देश देख रहा है कि इन्हें कश्मीर में सेना के जवानों पर पत्थर बरसा कर देशद्रोह के आचरण में लिप्त युवक “भटके हुए नौजवान” दिखते हैं और इनके मानवाधिकार इन्हें सताने लगते हैं लेकिन देश सेवा में घायल और शहीद होते सैनिकों और उनके परिवारों के कोई अधिकार इन्हें दिखाई नहीं देते?
देश देख रहा है कि ये लोग विपक्ष में रहते हुए सरकार के विरोध करने और देश का विरोध करने के अन्तर को भूल गए हैं।
काश की यह विपक्षी दल देश की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अपने आचरण से विपक्ष की गरिमा को उस ऊंचाई पर ले जाते कि देश की जनता पिछले चुनावों में दिए अपने फैसले पर दोबारा सोचने के मजबूर होती लेकिन उनका आज का आचरण तो देश की जनता को अपना फैसला दोहराने के लिए ही प्रेरित कर रहा है।

किसान कोई जाति या धर्म नहीं किसान देश की शान है -किसान नेता चौधरी शौकत अली चेची

किसान नेता चौधरी शौकत अली चेची स्वतंत्र भारत की प्रमुख गाथा पर प्रकाश डालने की कोशिश करते हुए समझना यह है की

हमारे पूर्वजों ने देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे कर संघर्ष कर देश को आजाद करने में हमें गुलामी से निजात कितनी मिली भारत के संविधान पर कितना अमल किया जा रहा है
आजादी की चिंगारी तो कई बार उठी और हमारे पूर्वजों ने अपने प्राणों की आहुति दी मगर मजबूती की शुरुआत लाहौर में 1929 में एक सेशन के दौरान नेहरू जी को अध्यक्ष चुना कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित कर आखिरी रविवार 1930 को स्वतंत्रता दिवस पूर्ण स्वराज के रूप में मनाया नेहरु जी ने लाहौर में रवि नदी के किनारे तिरंगा फहराया इसके बाद भारत ने 21 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रुप में मनाया ब्रिटिश देश में मौजूद थी संविधान सभा की घोषणा 9 दिसंबर 1946 से आरंभ कर 26 नवंबर 1949 में तैयार हुआ 1935 के एक्ट को हटाकर भारत के संविधान को लागू किया संविधान सभा के सदस्य राज्यों से चुने गए डॉक्टर भीमराव पंडित जवाहरलाल नेहरू डॉ राजेंद्र प्रसाद सरदार वल्लभ भाई पटेल मौलाना अबुल कलाम आदि इस सभा के मुख्य सदस्य थे कुल 22 समितियां थी मुस्लिम लिंग के सदस्य ने भाग नहीं लेने के कारण 11 दिसंबर 1946 को स्थाई अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में दूसरी बैठक हुई भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में 26 जनवरी 1950 को डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने सपत ली संविधान पारित होने में 6396272 रुपए खर्च हुए और 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन में संविधान कंप्लीट हुआ rss संघ के लोगों का स्वतंत्रता तथा भारत के संविधान में कोई योगदान नहीं था 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू किया गया भारत के सबसे पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु जी ने संसद के अंदर पढ़कर सुनाया डॉ भीमराव जी की संविधान बनाने में मुख्य भूमिका थी डॉ भीमराव के शब्दों ने कहा अनुभव करता हूं भारतीय संविधान व्यवहारिक है लचीला है और इस में शांति काल व युध्द काल में देश की एकता बनाए रखने की सामर्थया हे मैं यह कहना चाहूंगा कि हमारा संविधान बुरा है वरन हमको यह कहना होगा कि लोग बुरे हैं 1950 में पहली बार इंडोनेशिया के राष्ट्रपति शुक्रणो को सम्मिलित किया गया गणतंत्र दिवस की पहली परेड 1955 को दिल्ली के राजपथ पर हुई परेड के पहले मुख्य अतिथि पाकिस्तान के गवर्नर जर्नल मलिक गुलाम मोहम्मद थे 15 अगस्त व 26 जनवरी को मनाने पर विदेश के किसी न किसी गणमान्य हस्ती को परंपरा के तौर पर सम्मिलित किया जाता है जो कि हमारे पूर्वजों के सम्मान का विषय है खड़े होकर राष्ट्रीय गान गाया जाता है हमारे पूर्वज व शहीदों के बलिदान को याद किया जाता है हमारे पूर्वजों ने संविधान में सभी धर्म जाति को एक समान अधिकार देकर एक धागे में पीरो दिया नारा दिया हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई हम सभी आपस में भाई-भाई जय जवान जय किसान का नारा दिया वैसे तो हमारा देश अनेक तरह के फूलों के गुलदस्ते जैसा है भारत में लगभग 150 धर्म के मानने वाले लोग रहते हैं आजादी के बाद से अब तक हमारे देश ने काफी तरक्की की है मगर आज की राजनीति हमारे संविधान पूर्वजों के बलिदान को दरकिनार करने में मुख्य रोल अदा करती दिखाई दे रही है जिसमें गुमराह और नफरत एक समान अधिकार पर प्रश्नचिंह लगता दिखाई दे रहा है मीडिया सरकारी मुलाजिम राजनेता धर्मगुरु सत्ता पक्ष विपक्षी पार्टी ज्यादातर अपने स्वार्थी लहजे मैं काम करते दिखाई दे रहे हैं देश की आजादी मे और तरक्की में मुख्य रोल अदा किया किसानों ने अपने जी तोड़ संघर्ष के अनुसार पुण्य का काम भी करता आ रहा है सबसे ज्यादा आज के समय में किसान की दुर्दशा है देश की सीमा की रक्षा में किसानों के बेटे सबसे ज्यादा भागीदारी निभा रहे हैं देश में सभी के जीवन यापन में मुख्य रोल अदा कर रहे हैं देश के निर्यात में खुद की पैदा की गई वस्तुओं से देश का नाम रोशन कर लगभग देश की 70% अर्थव्यवस्था को सुचारु रुप से संभालने में मुख्य रोल अदा कर रहा है किसानों के ही चुने हुए नुमाइंदे उनको घृणा की दृष्टि से देख रहे हैं जब वह अपनी जायज़ मांगों को लेकर सामने आते हैं उन्हें गंदी गालियां दी जाती हैं गोलियों से मौत के घाट उतार दिया जाता है देशद्रोह जैसे कानूनों से जेल में डाल दिया जाता है लोन के नाम पर कई सो पर्सेंट की वसूली की जाती है किसान पर महंगाई की मार सबसे ज्यादा देश में पडती जा रही है लगभग 60 प्रतिशत किसान खेती छोड़ने पर मजबूर होता जा रहा है लागत के अनुसार किसान की इनकम घटती जा रही है नेताओं की सैलरी में 500 परसेंट का इजाफा अन्य सुविधा मिल रही है देश में हर कोई व्यक्ति अपने सामान पर अपना प्रिंट लगाकर बेच रहा है मगर किसान का रेट सरकार तथा व्यपारी अपने मन मौखिक लगाकर खरीद रहे हैं किसान जिस दर्द को लेकर सोता है उसी दर्द को लेकर जागता है अपनी तरक्की के लिए देश में सरकार बदलने में मुख्य रोल निभाता है मगर मायूसी के सिवा कुछ नहीं मिलता फसल बीमा के नाम पर गुमराह करके किसान को ठगा जा रहा है जिनको यह नहीं मालूम गेहूं की फसल में कितनी बार पानी दिया जाता है वह किसान नेता बन रहा है असली किसानों का बेवकूफ बना रहा है मोदी जी ने कुछ दिन पहले मन की बात में छत्तीसगढ़ की एक लेडीस किसान से सवाल किया कि आपकी आए दुगनी हो गई बगैर संकोच के लेडीज़ किसान ने हां मैं जवाब दिया मगर जब सच्चाई सामने आई तो उस लेडीज़ ने मीडिया के सामने बताया कि सरकारी अधिकारियों ने हमको ऐसा कहने के लिए कहा जब की सच्चाई यह है कि हम कई सालों से खेती करने में नुक्सान उठाते आ रहे हैं चारों तरफ झूठ फरेब धोखा धडी का बोल बाला नजर आ रहा है किसान कभी ऊपर वाले को देखता है कभी साहूकार को देखता है कभी सरकार को देखता है मायूसी मिलने के बाद फिर सोचता है मैं क्यों खेती करूं सबसे अच्छा है अब तो आत्महत्या करूं अंत में यही कहूंगा हम सभी को किसान को मजबूत करने की जरुरत है किसान कोई जाति या धर्म नहीं किसान देश की शान है किसान की फसल की कुछ वैरायटी पर नाम मात्र रेट बढ़ा कर वाह वाही लूटने का सरकारें ड्रामा बंद करें किसान मजबूत तो हमारा देश मजबूत किसान दुखी तो हमारा देश दुखी सरकार किसान पर मेहरबान होकर देखें देश की सूरत बदल जाएगी देश में अमन चैन तरक्की ऊर्जावान रोशनी की किरण बनकर दौड़ेगी देश महान हिंदुस्तान मजबूत है हमारा संविधान सभी सरकार करें किसान का ध्यान किसान से बडा परोपकारी देश में दूसरा है ही नहीं जय हिंद जय भारत वासी नहीं है यह बात जरा सी