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उसे बस उसका साथ चाहिए

उसे बस उसका साथ चाहि

वो जब उठ जाती है न
दूसरी का साथ देने के लिए तो…
कमज़ोर शब्द महत्व खो देता है ।
रस्म और रिवाज़ भी
आड़े नहीं आते अब उसके…
और पुरुष भूल जाता है
अपनी सदियों की प्रवृत्ति ।
ताक़ पर रख देता है अपना अहम
तो फ़िर ज़रूरत क्या है…
उस इंतज़ार की
कि वक़्त बदले ।
उसके हक़ के लिये…
बस एक और स्त्री
की ही दरकार है।
पलक झपकते ही
बदल जायेगा ये…
परिदृश्य, समाज और
भाव-विहीन मानवता ।।

डॉ शशि धनगर

राजनैतिक दल किसानों को इस कर्ज़ को लौटाने का सक्षम बनने की सोच देने के बजाए उसे माफ करके मुफ्तखोरी की संस्कृति को बढ़ावा देने की बात करते हैं – Dr Neelam Mahendra

किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की बात करने की बजाए उन्हें कर्ज़ देने की बात करते हैं। जब ये राजनैतिक दल किसानों को इस कर्ज़ को लौटाने का सक्षम बनने की सोच देने के बजाए उसे माफ करके मुफ्तखोरी की संस्कृति को बढ़ावा देने की बात करते हैं तो स्पष्ट है कि ऐसा करके वे ना तो किसानों का सोचते हैं ना देश का। बल्कि वो इस प्रकार का लालच देकर किसानों को सत्ता तक पहुंचने का एक जरिया मात्र समझते हैं।सत्तासुख के लिए ये राजनैतिक दल देश की अर्थव्यवस्था और उसके भविष्य को भी ताक पर रख देते हैं।

क़र्ज़ माफ़ी सत्ता की चाबी
तीन राज्यों में विधानसभा चुनावों के नतीजों के परिणामस्वरूप कांग्रेस की सरकार क्या बनी, न सिर्फ एक मृतप्राय अवस्था में पहुंच चुकी पार्टी को संजीवनी मिल गई, बल्कि भविष्य की जीत का मंत्र भी मिल गया। जी हाँ, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने इरादे स्पष्ट कर चुके हैं कि किसानों की कर्जमाफी के रूप में उन्हें जो सत्ता की चाबी हाथ लगी है उसे वो किसी भी कीमत पर अब छोड़ने को तैयार नहीं हैं। दो राज्यों के मुख्यमंत्रियो ने शपथ लेने के कुछ घंटों के भीतर ही चुनावों के दौरान कांग्रेस की सरकार बनते ही किसानों के कर्जमाफ करने के राहुल गांधी के वादे को अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया है। एक प्रकार से कांग्रेस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 2019 के चुनावी रण में उसका हथियार बदलने वाला नहीं है। लेकिन साथ ही कांग्रेस को अन्दर ही अंदर यह भी एहसास है कि इसका क्रियान्वयन आसान नहीं है। क्योंकि वो इतनी नासमझ भी नहीं है कि यह न समझ सके कि जब किसी भी प्रदेश में कर्जमाफी की घोषणा से उस प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर कितना विपरीत प्रभाव पड़ता है, तो जब पूरे देश में कर्जमाफी की बात होगी तो देश की अर्थव्यवस्था का क्या हाल होगा। मध्यप्रदेश को ही लें, कर्जमाफी की घोषणा के साथ ही मध्यप्रदेश की जनता पर 34 से 38 हज़ार करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ आ जाएगा।
पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी कहा है कि कर्जमाफी जैसे कदमों से देश को राजस्व का बहुत नुकसान होता है और इस प्रकार के फैसले देश की अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डालते हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि इन घोषणाओं का फायदा केवल सांठ गांठ वालों को ही मिलता है, गरीब किसानों को नहीं।उनके इस कथन का समर्थन कैग की वो रिपोर्ट भी करती है जो कहती है कि 2008 में कांग्रेस जिस कर्जमाफी के वादे के साथ सत्ता में आई थी, वो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई थी, जिस कारण उसका फायदा किसानों को नहीं मिल पाया। इसलिए जब वो राहुल जो चुनाव नतीजों के बाद अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में मानते हैं कि “कर्जमाफी किसानों की समस्या का सही समाधान नहीं है”, वो ही राहुल अब यह कहते हैं कि वे प्रधानमंत्री को तब तक सोने नहीं देंगे जब तक वह किसानों का कर्जा माफ नहीं कर देते, तो उनके इस कथन से नकारात्मक राजनीति की दुर्गंध आती है।कहीं वो इन तीन प्रदेशों में कांग्रेस द्वारा किए गए कर्जमाफी का ठीकरा केंद्र के मत्थे तो नहीं मढ़ना चाहते? कुछ भी हो,इस प्रकार की बयान बाजी से वे केवल देश की भोली भाली जनता की अज्ञानता का लाभ उठाकर अपने तत्कालिक राजनैतिक स्वार्थ को हासिल करने का लक्ष्य रखते हैं न कि किसानों की समस्या को सुलझाने का लक्ष्य। समझने वाली बात यह भी है कि दरअसल जब राजनैतिक दल किसानों की कर्जमाफी की बात करते हैं, तो वे किसानों की नहीं अपनी बात कर रहे होते हैं। उनका लक्ष्य किसानों की समस्या का हल नहीं अपने वोटों की समस्या का हल होता है। उनकी मंज़िल किसानों की खुशहाली सुनिश्चित करना नहीं अपनी पार्टी की जीत सुनिश्चित करना होता है।

यह बहुत ही खेद का विषय है कि आज हर राजनैतिक दल सत्ता चाहता है लेकिन इसे हासिल करने के लिए वो देश के लोकतंत्र का भी मज़ाक उड़ाने से नहीं हिचकता। जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था को देश की खुशाली और तरक्की का प्रतीक माना जाता था और जिस वोटर के हाथ सत्ता की चाबी होती थी, इन राजनैतिक पार्टियों की रस्साकस्सी ने उस लोकतंत्र और उसके नायक, एक आम आदमी, एक वोटर को आज केवल अपने हाथों की कठपुतली बनाकर छोड़ दिया है। क्योंकि वो इतना पढ़ा लिखा नहीं है, क्योंकि वो अपनी रोज़ी रोटी से आगे की सोच ही नहीं पाता, क्योंकि वो गरीब है, क्योंकि उसके दिन की शुरुआत पीने के लिए पानी की जुगाङ से शुरू होती है और उसकी सांझ दो रोटी की तलाश पर ढलती है, वो देश का भला बुरा क्या समझे,क्या जाने क्या चाहे ? वो किसान जो पूरे देश का पेट भरता है, जो कड़ी धूप हो या बारिश, सर्द बर्फीली हवाओं का मौसम हो या लू के थपेड़े, उसके दिन की शुरुआत कड़ी मेहनत से होती है लेकिन सांझ कांदा और सूखी रोटी से होती है।जो जी तोड़ मेहनत के बाद भी अपने परिवार की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की हर कोशिश में असफल हो जाता है वो देश की अर्थव्यवस्था के बारे में क्या जाने? लेकिन देश के राजनैतिक दल जो चुनाव जीतकर देश चलाने का वादा और दावा दोनों करते हैं, वो तो देश और उसकी अर्थव्यवस्था का भला और बुरा दोनों समझते हैं! उसके बावजूद जब वे किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की बात करने की बजाए उन्हें कर्ज़ देने की बात करते हैं। जब ये राजनैतिक दल किसानों को इस कर्ज़ को लौटाने का सक्षम बनने की सोच देने के बजाए उसे माफ करके मुफ्तखोरी की संस्कृति को बढ़ावा देने की बात करते हैं तो स्पष्ट है कि ऐसा करके वे ना तो किसानों का सोचते हैं ना देश का। बल्कि वो इस प्रकार का लालच देकर किसानों को सत्ता तक पहुंचने का एक जरिया मात्र समझते हैं।सत्तासुख के लिए ये राजनैतिक दल देश की अर्थव्यवस्था और उसके भविष्य को भी ताक पर रख देते हैं। क्या राहुल गांधी के पास इस बात का जवाब है कि 2008 में कांग्रेस द्वारा देश भर में किसानों की कर्जमाफी के बावजूद 2018 में भी किसानों की स्थिति में कोई सुधार क्यों नहीं आया? कर्जमाफी के बावजूद किसानों की आत्महत्या थम क्यों नहीं रहीं?
इसलिए बेहतर होता कि राहुल गांधी अपनी सोच का दायरा बढ़ाते, अपनी पार्टी से पहले देश का सोचते, अपने बयानों में परिपक्वता लाते, अब तक किसानों की नहीं,वोटों की सोच रहे थे, अब वोटों की नहीं किसानों की सोचें, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की सोचें क्योंकि उनकी इस प्रकार की गैर जिम्मेदार बयानबाजी से ना किसानों का फायदा होगा ना देश का। बल्कि अब भाजपा भी दबाव में आ गई है शायद इसीलिए भाजपा की असम सरकार ने किसानों के600 करोड़ रुपए का कर्ज माफ करने की घोषणा कर दी है और गुजरात की भाजपा सरकार ने ग्रामीण इलाकों में 6 लाख उपभोक्ताओं के सभी बकाया बिजली बिल माफ़ करने की घोषणा कर दी है। सोचने वाली बात यह है कि इस प्रकार की जो परिपाटी शुरू हो गई है उससे देश पीछे ही जायेगा आगे नहीं। राजनैतिक दल तो इस दलसल में फंसते ही जायेंगे और अंततः देश को भी इसी दलदल में डुबो देंगे। अब भी समय है चुनाव आयोग स्थिति की गंभीरता का संज्ञान ले और चुनावों के दौरान इस प्रकार के वादों को रिश्वत देकर खरीदने की श्रेणी में लाकर गंभीर अपराध घोषित करे तथा ऐसी घोषणाओं को करने वाली पार्टी पर प्रतिबंध लगाए
डॉ नीलम महेंद्र

महिला होना कुछ खास होता है। डॉ नीलम महेंद्र

अभी हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो जिसका शीर्षक था, ” रन लाइक अ गर्ल” अर्थात एक लड़की की तरह दौड़ो, काफी सराहा गया जिसमें 16- 28 साल तक की लड़कियों या फिर इसी उम्र के लड़कों से जब “लड़कियों की तरह” दौड़ने के लिए कहा गया तो लड़के तो छोड़िए लड़कियाँ भी अपने हाथों और पैरों से अजीब अजीब तरह के ऐक्शन करते हुए दौड़ने लगीं। कुल मिलाकर यह बात सामने आई कि उनके अनुसार “लड़कियों की तरह दौड़ने” का मतलब “कुछ अजीब तरीके से” दौड़ना होता है। लेकिन जब एक पाँच साल की बच्ची से पूछा गया कि अगर तुमसे कहा जाए कि लड़कियों की तरह दौड़ कर दिखाओ तो तुम कैसे दौड़ोगी? तो उसका बहुत ही सुन्दर जवाब था, “अपनी पूरी ताकत और जोश के साथ”।

मतलब साफ़ है कि एक पांच साल की बच्ची के लिए “दौड़ने” और “लड़कियों जैसे दौड़ने” में कोई अंतर नहीं है लेकिन एक व्यस्क लड़के या लड़की के लिए दोनों में बहुत फर्क है। यहाँ गौर करने वाले दो विषय हैं पहला यह कि बात केवल महिलाओं के प्रति समाज के नजरिये की ही नहीं है बल्की खुद महिलाओं की स्वयं अपने प्रति उनके खुद के नजरिये की है दूसरा यह कि यह नजरिया एक बच्ची में नहीं दिखता ।
21 वीं सदी में, आज जब हम केवल भारत ही नहीं बल्कि वैश्विक परिदृश्य पर वर्तमान की अपनी इस मानव सभ्यता को आंकते हैं तो निश्चित ही स्वयं को इतिहास में अब तक की सबसे विकसित सभ्यता होने का दर्जा देते हैं।
लेकिन फिर भी जब इस तथाकथित विकसित सभ्यता में लैंगिक समानता की बात आती है तो परिस्थितियां केवल भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व में बेहद निराशाजनक हैं।
क्योंकि बात दरअसल यह है कि आज भी महिलाओं को उनकी “योग्यता” के आधार पर नहीं,बल्कि उन्हें एक “महिला होने” के आधार पर ही आंका जाता है।
आज भी देखा जाए तो विश्व में कहीं भी महत्वपूर्ण और उच्च पदों पर महिलाओं की नियुक्ती न के बराबर है। और यह स्थिति दुनिया के लगभग हर देश में ही है क्योंकि खुद को एक ईकवीटेबल सोसायटी कहने वाला विश्व का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका भी आज तक अपने लिए एक महिला राष्ट्रपति नहीं चुन पाया है।
लेकिन बात केवल इतनी भर हो, ऐसा भी नहीं है बल्कि बात यह भी है कि जिन पदों पर महिलाओं की नियुक्ति की जाती है वहाँ भी उन्हें उसी काम के लिए पुरुषों के मुकाबले कम वेतन दिया जाता है। यहाँ शायद यह जानना रोचक होगा कि यह बात हाल ही में विश्व में महिलाओं की वर्तमान सामाजिक स्थिति से सम्बन्धित एक रिपोर्ट में सामने आई कि ब्रिटेन जैसे विकसित देश में भी कई बड़ी बड़ी कम्पनियों में महिलाओं को उसी काम के लिए पुरुषों के मुकाबले कम वेतन दिया जाता है।
तो अब जब इन तथाकथित उदार और मोर्डन सोसाइटीस में महिलाओं की यह स्थिति है तो भारत में हमारे लिए एक समाज के रूप में यह समझ लेना भी आवश्यक है कि इन देशों की “उदार और मार्डन” सोच केवल महिलाओं के कपड़ों और खान पान तक ही सीमित है। बात जब उनके प्रति दृष्टिकोण और आचरण की आती है तो इन तथाकथित उदारवादी संस्कृति वाले देशों में भी जेन्डर इनइक्वेलिटी यानी लैंगिक असमानता व्याप्त है।
लेकिन इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हमारे लिए यह एक संतोष का विषय न होकर एक गहन चिंतन का विषय होना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों है? और जब हम सोचेंगे तो पाएंगे कि दरअसल एक समाज के रूप में यह हमारी एक मानसिक स्थिति है जिसकी जड़ें काफ़ी गहरी हैं।
अब अगर इस सोच की जड़ों को खोजेंगे तो पाएंगे कि इस सोच के बीज अपने बच्चों में न सिर्फ हम खुद ही बोते हैं बल्कि उन्हें लगातार पोषित भी करते हैं। कैसे?
वो ऐसे कि बचपन से ही जब ये बच्चे कुछ समझने लायक हो जाते हैं तो हम उन्हें कहानियाँ सुनाते हैं और जब पढ़ने लायक हो जाते हैं तो इन्हें पुस्तकें पढ़ने के लिए देते हैं, और आपको शायद यह जान कर अजीब लगे लेकिन इन कहानियों के द्वारा ही अनजाने में हम इस मानसिकता के बीज अपने बच्चों के ह्रदय में डाल देते हैं, जैसे कि एक सुंदर और नाजुक सी राजकुमारी को एक राक्षस ले जाता है जिसकी कैद से उसे एक ताकतवर राजकुमार आकर बचाता है, हमारे बच्चों के मन में इस प्रकार की कहानियाँ किस मानसिकता के बीज बोते होंगे?
शायद अब हम समझ पा रहे हैं एक पांच साल की बच्ची और एक व्यस्क लड़के या लड़की की सोच के उस अन्तर को जो कि हमारे ही द्वारा डाला जाता है और कालांतर में समाज में भी दिखाई देता है।
इसलिए एक सभ्य एवं विकसित समाज के रूप में हमारे लिए यह समझना बेहद आवश्यक है कि केवल समाज ही नहीं बल्की महिलाओं को भी स्वयं अपने प्रति नजरिया बदलने की जरूरत है। सबसे पहली और सबसे अहम बात कि महिला होने का अर्थ अबला होना नहीं होता और न ही कुछ स्टीरियोटाइप होना होता है बल्कि महिला होना “कुछ खास” होता है, जो आप हैं जैसी आप हैं वैसे ही होना होता है, अपना सर्वश्रेष्ठ देना होता है और अपने आत्मबल से अपने प्रति समाज की सोच बदल देना होता है। स्वयं के एक स्त्री होने का जश्न मनाना होता है

हक़ था मेरा उस पल पर – डॉ शशि धनगर

हक़ था मेरा उस पल पर
ऐसे भी और वैसे भी…
ज़िन्दगी आयी हो सामने
फ़िर मेरे जैसे भी…।
कारवाँ गुज़रा था पूरा
ओ, मेरे जाने-जहाँ
उन दरख़्तों के दरमियाँ
तड़पेगा वो सैयाद
देखना ऐसे भी और वैसे भी…।
मौसम पलटते हैं
चाहे सदियों बाद ही सही
होते हैं बागवां गुलज़ार
चाहे कुछ गुलों के लिए ही…।
बस यही बची है आस
कि आएगा वो लेकर
मेरे हिस्से की उजास…
जिससे करती हूँ मैं अरदास
तब जाकर ही कहीं
सम्पूर्ण होगा ये जीवनचक्र
और फिर थम जाएगी ये साँस
ऐसे भी और वैसे भी…।।

डॉ शशि धनगर ©®

आ गया हिंदी-दिवस-डॉ शशि धनगर

और सबकी संदर्भित चिंताएं भी…कैसे हिंदी को बचाएं…और कैसे सम्मान दिलाएं..
14 सितम्बर (हिंदी- दिवस) पर विशेष
.ज्यादा कुछ नहीं करना है…बस स्वयं को मजबूत करें…स्वयं के लिए जीना सीख लें…क्योंकि बहुत कुछ है, जो हो रहा है हिंदी के विकास के लिए…आज भी सभी हिंदी-भाषी सोचते हिंदी में ही हैं…खुश होना, दुखी होना, आत्मविभोर होना जैसी मानव होने की सारी अनुभूतियाँ हिंदी में ही महसूस करते हैं….और रही बात समाज में सम्मान की…तो बहुत दूर तक रास्ते जा रहे हैं…ढेरों कवितायेँ…कहानियां…ग़ज़ल…मुक्तक…उपन्यास..

जैसी हिंदी लेखन की तमाम विधाएं राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लिखीं जा रहीं है…पढ़ीं जा रहीं हैं, और सराही जा रहीं हैं…! हिंदी फ़िल्में और गीत इतनी क्षमता रखते हैं…कि हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि से दूर-दूर तक रिश्ता न रखने वाले भाषा-भाषी लोग मेरे पास माँ है..का मतलब समझते हैं…!

जरूरत है खुद को सम्मानित करने की…कि हमे हिंदी बोलने में फ़क्र महसूस हो…और यह तभी होगा जब हम अपने कार्यक्षेत्र में निपुण हों…और अपना सर्वोतम दें…! अपने आप को स्वयं के लिए साबित करें…!
इंग्लिश एक अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है…उसे अपनाने में कोई बुराई नहीं है…क्योंकि वैश्विक स्तर पर उत्तरजीविता के लिए अनिवार्य सी हो गयी है…! इसलिए इंग्लिश सीखनी भी चाहिए…! क्योंकि इंग्लिश  बोलने वाले लोग जब हिंदी में बोलते हैं… तो लोग और अधिक अभिमान महसूस करते है…!
जब हम ख़ुद को अपने क्षेत्र में सर्वोपरि पाते हैं…खुद को समाज और परिवार में सम्मानित महसूस करते हैं…तो किसी भी प्रकार की हीनभावना नहीं पनपने पाती…! हाँ यही कारण है…कि अच्छी इंग्लिश बोलने वाले हिंदी बोलने में गर्वान्वित महसूस करते हैं …अन्यथा थोडा भी सोचें तो स्पष्ट हो जायेगा…कि कुछ लोग हिंदी में और अच्छी हिंदी बोलने के लिए ही विख्यात हैं…!
अर्थात भाषा का अपने-आप में सम्मान ज्यादा महत्व नहीं रखता…इससे जुड़े लोगों का आचरण और व्यवहार और उनकी समाज के प्रति जिम्मेदारियां निभाने की मानसिकता निर्धारित करती है…कि हिंदी का भविष्य क्या है…जो….निसंदेह उज्जवल है…क्योंकि लगभग १ अरब लोगों की सोच को शामिल किये बिना तो गूगल भी विकास नहीं कर सकता…इसीलिए आज ढेरों एप आ चुके हैं, जो हिंदी भाषी लोगों के मनोव्यवहारों को प्रदर्शित करने में प्रयत्नशील हैं…!
बस हम स्वयं को सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक और मानसिक रूप से मजबूत करें और सम्मान दें…बाकि हमसे जुडा परिवेश, भाषा और शैली स्वमेव ही प्रगति करेंगे…!

डॉ शशि धनगर